नायका | भारतीय नायक
वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित के वक्तव्य ने शिक्षा जगत में नई बहस को जन्म दिया है। सम्मेलन में उन्होंने भारतीय परंपरा, इतिहास, नारीवाद और विश्वविद्यालयों की भूमिका पर अपने विचार रखे।
उनके वक्तव्य का एक हिस्सा खास तौर पर चर्चा में आया, जिसमें उन्होंने पश्चिमी चिंतक सिमोन द बोउवार से नारीवाद की शुरुआत मानने वाली धारणा पर असहमति जताते हुए द्रौपदी को पहली नारीवादी बताया। यह पहली बार नहीं है जब पंडित ने द्रौपदी और सीता के संदर्भ में ऐसी व्याख्या रखी है। 2022 में दिल्ली विश्वविद्यालय के एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में भी उन्होंने सीता और द्रौपदी को शुरुआती नारीवादी व्यक्तित्वों के रूप में प्रस्तुत किया था।
भारतीय ज्ञान परंपरा के मंच से उठी बात
बीएचयू में आयोजित सम्मेलन का केंद्र भारतीय ज्ञान परंपरा और उसके विभिन्न आयामों पर चर्चा था। ऐसे मंच पर इतिहास, संस्कृति और भारतीय परंपराओं की आधुनिक व्याख्या स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण विषय बन जाती है।
पंडित ने इसी संदर्भ में इतिहास को देखने के तरीकों पर सवाल उठाए। उनका तर्क रहा कि भारतीय इतिहास और परंपरा को केवल पश्चिमी विचारों के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने द्रौपदी के चरित्र को महिलाओं की स्वतंत्र आवाज और सवाल उठाने की क्षमता के संदर्भ में देखने की बात कही।
यह दृष्टिकोण अपने आप में एक अकादमिक बहस का विषय है। एक तरफ इसे भारतीय ग्रंथों में मौजूद स्त्री-पात्रों को नए नजरिए से पढ़ने की कोशिश माना जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ सवाल उठता है कि आधुनिक ‘फेमिनिज्म’ की अवधारणा को प्राचीन पात्रों पर लागू करते समय ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों का कितना ध्यान रखा जाए।
JNU को लेकर टिप्पणी भी चर्चा में
पंडित के वक्तव्य का दूसरा हिस्सा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को लेकर था। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने JNU को आर्थिक संसाधनों के लिहाज से ‘भिखारी’ बताते हुए विश्वविद्यालय में मंदिर स्थापित करने की बात कही और कहा कि इससे संस्थान के लिए अधिक धन जुटाया जा सकता है।
यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि JNU देश के प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालयों में गिना जाता है और वहां शिक्षा, शोध तथा सार्वजनिक नीति से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण संस्थान और केंद्र काम करते हैं। विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट भी उसके विभिन्न अकादमिक कार्यक्रमों और भारतीय ज्ञान, संस्कृति तथा सामाजिक विज्ञान से जुड़े आयोजनों को दर्ज करती है।
इसलिए कुलपति की टिप्पणी के बाद बहस सिर्फ मंदिर या धन जुटाने तक सीमित नहीं रहती। बड़ा सवाल यह है कि किसी सार्वजनिक विश्वविद्यालय की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए धार्मिक संस्थान की भूमिका को किस तरह देखा जाना चाहिए?
परंपरा और आधुनिक अकादमिक सोच के बीच संतुलन
भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा करते समय प्राचीन ग्रंथों और पात्रों की आधुनिक संदर्भों में व्याख्या होना कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन विश्वविद्यालयों में ऐसी व्याख्याओं की खासियत यह होती है कि वहां अलग-अलग विचारों को साथ रखने की गुंजाइश रहती है।
द्रौपदी को नारीवादी प्रतीक के तौर पर देखना एक व्याख्या है। इसे इतिहास का अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय एक अकादमिक दृष्टिकोण के रूप में देखना अधिक उपयोगी हो सकता है। इसी तरह विश्वविद्यालयों की आर्थिक स्थिति पर चर्चा भी आंकड़ों, बजट और संस्थागत जरूरतों के आधार पर होनी चाहिए।
यही वह जगह है जहां भारतीय परंपरा और आधुनिक अकादमिक विमर्श एक-दूसरे से संवाद कर सकते हैं।
पंडित के बयान ने फिलहाल यह बहस जरूर तेज कर दी है कि भारत की प्राचीन परंपराओं को आज के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में किस तरह पढ़ा जाए। साथ ही यह सवाल भी सामने है कि विश्वविद्यालयों जैसे सार्वजनिक संस्थानों में विचार, आस्था और अकादमिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
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