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मेरठ में किसान नेता से कथित मारपीट पर बवाल, SSP अविनाश पांडेय हटाए गए


मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ में छात्रा ललिता गौतम हत्याकांड को लेकर चल रहे विवाद के बीच किसान नेता दिग्विजय भाटी और तत्कालीन SSP अविनाश पांडेय से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा में है। भाटी ने आरोप लगाया है कि 19 अगस्त को SSP कार्यालय पहुंचने के बाद उनके साथ पुलिसकर्मियों ने मारपीट की। हालांकि, पुलिस की ओर से इन आरोपों को खारिज करते हुए घटना की अलग तस्वीर पेश की गई है।

ललिता गौतम हत्याकांड से जुड़ा है विवाद

पूरा मामला मेरठ की छात्रा ललिता गौतम की हत्या के बाद शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ा है। प्रदर्शनकारियों की ओर से मामले में कार्रवाई और न्याय की मांग की गई थी। जुलाई में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी थी। पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया और गिरफ्तारियां भी की थीं। दिग्विजय भाटी का नाम भी इस मामले में सामने आया था।

इसके बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठते रहे। एक मामले में SSP समेत पुलिसकर्मियों के खिलाफ अदालत में शिकायत भी दाखिल की गई थी।

भाटी ने लगाए गंभीर आरोप

अब दिग्विजय भाटी ने आरोप लगाया है कि वह 19 अगस्त को ललिता गौतम हत्याकांड से संबंधित बातचीत के लिए मेरठ SSP कार्यालय पहुंचे थे। उनके मुताबिक, वहां पुलिस अधिकारियों के साथ बातचीत के दौरान स्थिति बिगड़ गई और उनके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई।

भाटी की ओर से यह भी दावा किया गया है कि बाद में उन्हें SOG कार्यालय ले जाकर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया और इस दौरान उन्हें गंभीर चोटें आईं। उनकी ओर से लगाए गए आरोपों में आंख में गंभीर चोट लगने की बात भी कही गई है।

हालांकि, इन आरोपों को तथ्य के रूप में स्थापित करने से पहले निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों में SSP अविनाश पांडेय ने किसान नेता द्वारा लगाए गए मारपीट के आरोपों को खारिज किया है। पुलिस के अनुसार, विवाद पुलिसकर्मियों के साथ कहासुनी और हिरासत से जुड़ा था।

20 अगस्त को हुआ बड़ा प्रशासनिक फेरबदल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच 20 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार ने कई IPS अधिकारियों के तबादले किए। इसी फेरबदल में मेरठ के SSP अविनाश पांडेय को पद से हटा दिया गया। उनके स्थान पर नई तैनाती की गई।

हालांकि, केवल तबादले को किसान नेता के आरोपों की पुष्टि नहीं माना जा सकता। सरकार ने प्रशासनिक फेरबदल का व्यापक आदेश जारी किया था, इसलिए दोनों घटनाओं के बीच सीधे कारण-परिणाम का निष्कर्ष जांच के बिना निकालना उचित नहीं होगा।

अब सबसे बड़ा सवाल निष्पक्ष जांच का

मेरठ की इस पूरी कहानी में दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं। एक तरफ किसान नेता पुलिस पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ पुलिस इन आरोपों को गलत बताते हुए अपनी कार्रवाई को अलग तरीके से पेश कर रही है।

ऐसे में सबसे जरूरी सवाल यही है कि क्या पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होगी? अगर किसी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी पर कानून से बाहर जाकर कार्रवाई करने का आरोप है तो उसकी जांच होनी चाहिए, और यदि आरोप गलत हैं तो तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

ललिता गौतम हत्याकांड से शुरू हुआ यह विवाद अब पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर रहा है। आने वाले दिनों में जांच और आधिकारिक कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा कि 19 अगस्त की घटना में वास्तव में क्या हुआ था।

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