अयोध्या: श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में पहले पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी CEO की नियुक्ति की प्रक्रिया अब चर्चा का विषय बन गई है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस पद के लिए उम्मीदवारों से जुड़े एक 34-सवाल वाले गूगल फॉर्म में उनकी व्यक्तिगत जीवनशैली और धार्मिक आचरण से जुड़े सवाल भी पूछे गए। इनमें शाकाहारी या मांसाहारी होने, जनेऊ पहनने, शिखा रखने, शराब का सेवन करने और स्वयं को ‘कट्टर हिंदू’ मानने जैसे प्रश्न शामिल बताए गए हैं।
यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि CEO का पद केवल धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस भूमिका में ट्रस्ट के प्रशासनिक, कानूनी और वित्तीय मामलों को संभालना, ट्रस्ट डीड के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करना और वित्तीय पारदर्शिता बनाए रखना जैसी जिम्मेदारियां शामिल हैं।
5 हजार आवेदनों में से 18 उम्मीदवार शॉर्टलिस्ट
रिपोर्टों के अनुसार CEO पद के लिए करीब 5,000 आवेदन प्राप्त हुए थे। चयन समिति ने इनमें से 18 उम्मीदवारों को आगे की प्रक्रिया के लिए शॉर्टलिस्ट किया। इनमें पूर्व प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ सैन्य पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार भी शामिल बताए गए हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि किसी प्रशासनिक पद के उम्मीदवार का मूल्यांकन किन आधारों पर किया जाना चाहिए?
प्रशासनिक अनुभव, वित्तीय प्रबंधन, कानून की समझ, नेतृत्व क्षमता और पारदर्शिता जैसे पेशेवर मानकों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन जब चयन प्रक्रिया में व्यक्ति के खान-पान या धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़े सवाल सामने आते हैं, तो यह बहस शुरू होना भी स्वाभाविक है कि इन व्यक्तिगत पहलुओं का पद की जिम्मेदारियों से क्या संबंध है।
धार्मिक आस्था और प्रशासनिक योग्यता की बहस
जनेऊ पहनना, शिखा रखना या शाकाहारी होना किसी व्यक्ति की निजी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हो सकता है। लेकिन किसी बड़े संस्थान के प्रशासनिक पद के लिए इन बातों को चयन प्रक्रिया में कितना महत्व दिया जाना चाहिए—यही इस पूरे विवाद का केंद्रीय प्रश्न बन गया है।
दूसरी तरफ, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक धार्मिक ट्रस्ट से जुड़ा प्रशासनिक पद है। इसलिए ट्रस्ट चयन के दौरान उम्मीदवारों की धार्मिक समझ या संस्था के स्वरूप से उनकी परिचितता को प्रासंगिक मान सकता है। असली सवाल चयन के मानदंडों की पारदर्शिता और प्रासंगिकता का है।
पारदर्शिता क्यों जरूरी?
CEO की नियुक्ति ऐसे समय में हो रही है जब राम मंदिर ट्रस्ट के कामकाज को लेकर पहले से सार्वजनिक चर्चा चल रही है। हाल के महीनों में मंदिर के चढ़ावे से जुड़ी कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं की जांच भी हुई है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में SIT गठित की थी और कई कर्मचारियों की गिरफ्तारी की खबरें सामने आई थीं।
इसी पृष्ठभूमि में CEO जैसे महत्वपूर्ण पद की नियुक्ति में पारदर्शिता की मांग और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
लखनऊ के पूर्व IPS अधिकारी अमिताभ ठाकुर, जो खुद भी इस पद के लिए आवेदन कर चुके हैं, ने चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की है और शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक करने की बात कही है।
अब सबसे बड़ा सवाल
राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा है। ऐसे संस्थान के प्रशासन में नियुक्ति जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी है।
क्या उम्मीदवार की योग्यता का आधार उसका प्रशासनिक अनुभव और जिम्मेदारी निभाने की क्षमता होना चाहिए?
या धार्मिक आचरण भी चयन का हिस्सा होना चाहिए?
और अगर धार्मिक आचरण को महत्व दिया जा रहा है, तो उसके स्पष्ट और सार्वजनिक मानदंड क्या हैं?
इन सवालों के जवाब केवल एक CEO की नियुक्ति तय नहीं करेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि इतनी बड़ी धार्मिक संस्था अपने प्रशासन में योग्यता, आस्था और पारदर्शिता के बीच संतुलन किस तरह बनाती है।
NAYAK — भारतीय नायक
*सवाल वही, जो व्यवस्था और जनता के भरोसे से जुड़े हों।*
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