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पीएम केयर्स फंड में ₹8,452 करोड़ बाकी, एक साल में खर्च सिर्फ ₹87 लाख; पारदर्शिता पर फिर उठे सवाल


नई दिल्ली। कोरोना महामारी के दौरान आपात स्थिति और आपदाओं से निपटने के उद्देश्य से बनाए गए पीएम केयर्स फंड को लेकर सामने आई ताजा वित्तीय जानकारी ने एक बार फिर इसके इस्तेमाल और पारदर्शिता पर बहस तेज कर दी है। 31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक फंड के पास करीब ₹8,452 करोड़ की राशि मौजूद थी, जबकि पूरे वित्त वर्ष में इससे लगभग ₹87 लाख खर्च किए गए।

पीएम केयर्स फंड की स्थापना मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान हुई थी। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इसका उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल, प्राकृतिक या मानव-निर्मित आपदा और अन्य संकट की परिस्थितियों में राहत एवं सहायता उपलब्ध कराना है। फंड को एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत किया गया है।

दो साल की देरी के बाद सामने आए आंकड़े

ताजा जानकारी सामने आने के साथ चर्चा का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर भी है कि वित्तीय विवरण सार्वजनिक होने में देरी क्यों हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 2024-25 के वित्तीय आंकड़ों में फंड की स्थिति स्पष्ट हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक फंड का बैलेंस करीब ₹8,452 करोड़ था।

यह रकम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पीएम केयर्स को संकट के समय तेजी से राहत उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया था। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी राशि उपलब्ध रहने के बावजूद एक वित्त वर्ष में खर्च बेहद कम क्यों रहा?

हालांकि केवल खर्च की राशि देखकर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि फंड का इस्तेमाल नहीं हुआ। फंड के पास उपलब्ध धन और किसी विशेष वित्त वर्ष में खर्च की गई रकम अलग-अलग वित्तीय पहलू हैं। इसलिए पूरे लेखे-जोखे और खर्च के मदों को साथ देखकर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

आखिर पैसा कहां और कैसे इस्तेमाल हुआ?

यही वह सवाल है जिस पर सबसे ज्यादा सार्वजनिक चर्चा हो रही है।

आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार पीएम केयर्स में व्यक्तियों और संगठनों से स्वैच्छिक योगदान मिलता है और इसे सरकारी बजटीय सहायता नहीं मिलती। फंड का इस्तेमाल उसके निर्धारित उद्देश्यों के लिए किया जाना है।

लेकिन आम नागरिक के लिए सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि फंड में कितना पैसा है। सवाल यह भी है कि किस संकट के लिए कितना पैसा रखा गया, कितना खर्च किया गया और किस मद में खर्च किया गया?

अगर किसी फंड का उद्देश्य आपातकाल में तुरंत सहायता पहुंचाना है, तो उसके वित्तीय संचालन की जानकारी जितनी स्पष्ट होगी, जनता का भरोसा उतना ही मजबूत होगा।

ऑडिट पर भी उठते रहे हैं सवाल

पीएम केयर्स की ऑडिट व्यवस्था को लेकर भी लंबे समय से सार्वजनिक बहस होती रही है। फंड की आधिकारिक FAQ के मुताबिक इसकी लेखापरीक्षा एक स्वतंत्र ऑडिटर द्वारा की जाती है।

यहां एक जरूरी बात समझना भी आवश्यक है—ऑडिट होना और ऑडिट रिपोर्ट का सार्वजनिक रूप से आसानी से उपलब्ध होना दो अलग बातें हैं। पारदर्शिता की बहस मुख्य रूप से इसी अंतर को लेकर है।

जनता यह जानना चाहती है कि फंड में आने वाले धन, निवेश, खर्च और शेष राशि का पूरा वित्तीय विवरण किस तरह सार्वजनिक किया जाता है।

सरकार के लिए भरोसा बनाए रखने की चुनौती

पीएम केयर्स फंड का गठन जिस समय हुआ था, वह देश के लिए असाधारण संकट का दौर था। उस समय बड़ी संख्या में लोगों और संस्थाओं ने राहत की उम्मीद से इसमें योगदान किया था।

आज जब फंड में हजारों करोड़ रुपये की राशि मौजूद होने की जानकारी सामने आई है, तो सरकार और ट्रस्ट के सामने चुनौती सिर्फ धन का प्रबंधन करना नहीं, बल्कि उस प्रबंधन को जनता के सामने पर्याप्त स्पष्टता से रखना भी है।

क्योंकि सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जिसके आधार पर लोगों ने संकट के समय इस फंड में योगदान दिया।

NAYAK का सवाल सीधा है—जब पीएम केयर्स का उद्देश्य आपातकाल में मदद करना है, तो ₹8,452 करोड़ की उपलब्ध राशि, ₹87 लाख के वार्षिक खर्च और फंड की ऑडिट जानकारी को लेकर हर जरूरी तथ्य जनता के सामने पूरी पारदर्शिता से क्यों नहीं रखा जाना चाहिए?

आखिर जनता के भरोसे से बना फंड हो तो जनता को उसके हिसाब-किताब की जानकारी भी साफ तौर पर मिलनी चाहिए।

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