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हर 68 सेकंड में एक ब्लॉकिंग आदेश! सोशल मीडिया पर सरकार की बढ़ती निगरानी से उठे बड़े सवाल



नई दिल्ली। भारत में सोशल मीडिया कंटेंट को लेकर सरकारी कार्रवाई के आंकड़ों ने एक नई बहस छेड़ दी है। मार्च से जुलाई 2026 के बीच इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब को करीब 1.95 लाख ब्लॉकिंग आदेश भेजे गए। यानी औसतन हर 68 सेकंड में एक आदेश। ये आंकड़े द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा हासिल किए गए सरकारी डेटा के हवाले से सामने आए हैं।

इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं है कि 1.95 लाख पोस्ट या अकाउंट निश्चित रूप से ब्लॉक किए गए। एक सरकारी आदेश में कई पोस्ट, वीडियो या अकाउंट पर कार्रवाई के निर्देश शामिल हो सकते हैं। इसलिए आदेशों की संख्या और वास्तव में हटाए गए कंटेंट की संख्या अलग-अलग हो सकती है।

इंस्टाग्राम सबसे ज्यादा निशाने पर

तीनों बड़े प्लेटफॉर्म्स में इंस्टाग्राम को सबसे ज्यादा सरकारी निर्देश मिले। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मार्च से जुलाई के बीच इंस्टाग्राम को करीब एक लाख, फेसबुक को लगभग 80 हजार और यूट्यूब को करीब 15 हजार ब्लॉकिंग आदेश भेजे गए। यानी इंस्टाग्राम और फेसबुक को मिलाकर तीनों प्लेटफॉर्म्स को भेजे गए आदेशों का करीब 90 फीसदी हिस्सा इन दोनों प्लेटफॉर्म्स से जुड़ा था।

यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी अवधि में सोशल मीडिया पर राजनीतिक बहस, छात्र आंदोलनों और सरकार की नीतियों को लेकर तीखी चर्चा देखने को मिली।

पिछले आंकड़ों से तुलना ने बढ़ाई चिंता

मामले की गंभीरता समझने के लिए पिछले उपलब्ध रिकॉर्ड से तुलना भी जरूरी है। अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच सहयोग पोर्टल के माध्यम से 19 ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को कुल 2,312 ब्लॉकिंग आदेश भेजे गए थे। यानी उस पूरे साल में औसतन करीब छह आदेश प्रतिदिन थे। इसके मुकाबले मार्च से जुलाई 2026 के केवल पांच महीनों में 1.95 लाख आदेश का आंकड़ा सामने आया है।

हालांकि दोनों अवधियों और आंकड़ों की सीधी तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि रिपोर्टिंग व्यवस्था और उपलब्ध डेटा समान हो, यह जरूरी नहीं है। फिर भी इतनी बड़ी संख्या अपने आप में सरकारी कंटेंट-मॉडरेशन व्यवस्था के पैमाने को लेकर सवाल जरूर खड़े करती है।

‘सहयोग’ पोर्टल और मेटा का ऑटोमेशन

इन आदेशों का बड़ा हिस्सा गृह मंत्रालय के ‘सहयोग’ पोर्टल के जरिए भेजा गया। यह सरकारी और राज्य एजेंसियों को सोशल मीडिया कंपनियों तक कंटेंट हटाने या ब्लॉक करने संबंधी निर्देश पहुंचाने की सुविधा देता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, मेटा ने सरकारी निर्देशों पर तेजी से कार्रवाई के लिए अपने API को सहयोग पोर्टल से जोड़ दिया है। इसके कारण पोर्टल के जरिए चिह्नित कंटेंट पर निर्धारित समयसीमा में स्वचालित कार्रवाई संभव हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस प्रक्रिया में हर आदेश की अलग मानवीय समीक्षा जरूरी नहीं रह जाती।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—अगर कोई आदेश गलत, अधूरा या संदर्भ से अलग हो तो उसकी स्वतंत्र समीक्षा कौन करेगा?

सुरक्षा और अभिव्यक्ति के बीच संतुलन जरूरी

सरकार के पास निश्चित रूप से ऐसे कंटेंट पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है जो कानून का उल्लंघन करता हो, हिंसा या गंभीर नुकसान को बढ़ावा देता हो या अन्य वैधानिक आधारों के तहत हटाया जाना जरूरी हो। लेकिन दूसरी तरफ लोकतंत्र में सोशल मीडिया आम नागरिकों के लिए अपनी बात रखने का बड़ा मंच भी है।

इसलिए कंटेंट हटाने की प्रक्रिया जितनी तेज हो, उतनी ही पारदर्शी और जवाबदेह होना भी जरूरी है। किसी पोस्ट को हटाने का कारण क्या था? आदेश किस अधिकारी ने दिया? प्रभावित व्यक्ति या प्लेटफॉर्म के पास समीक्षा या चुनौती का रास्ता क्या है? और कितने आदेशों में बाद में गलती पाई गई?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।

क्योंकि मुद्दा सिर्फ 1.95 लाख आदेशों का नहीं है। असली सवाल यह है कि डिजिटल भारत में सरकार और नागरिक की आवाज के बीच संतुलन कैसे कायम रहेगा।

सरकार अगर गलत सूचना और अवैध कंटेंट पर कार्रवाई करती है तो उसका स्पष्ट आधार जनता के सामने होना चाहिए। वहीं आलोचना, असहमति और जनहित की आवाज को दबने से बचाने के लिए स्वतंत्र निगरानी और प्रभावी अपील व्यवस्था भी जरूरी है।

NAYAK का सवाल सीधा है—कंटेंट हटाने की रफ्तार बढ़ रही है, लेकिन क्या उसके साथ जवाबदेही और पारदर्शिता भी उसी रफ्तार से बढ़ रही है?

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