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शामली के आयुष मलिक को हाईकोर्ट से राहत, धर्म और जीवनसाथी चुनने के अधिकार पर अहम टिप्पणी

प्रयागराज/शामली: उत्तर प्रदेश के शामली से सामने आया आयुष मलिक का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। 31 वर्षीय आयुष मलिक को अदालत ने मुक्त कर दिया। आयुष ने अदालत के सामने कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया और मुस्लिम महिला चांदनी कुरैशी से शादी करने का फैसला भी अपनी मर्जी से लिया। उनका आरोप था कि इसके बाद उनके पिता ने उन्हें धमकाकर घर में नजरबंद कर दिया था।

यह मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए हाईकोर्ट पहुंचा। याचिका आयुष के दोस्त की ओर से दाखिल की गई थी। अदालत ने पहले आयुष को उसके पिता और राज्य अधिकारियों के जरिए पेश करने का निर्देश दिया था। 16 सितंबर को जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ के सामने आयुष पेश हुए। 

आयुष ने अदालत को बताया कि उन्होंने इस्लाम अपनाने का फैसला बिना किसी दबाव, धमकी, जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव के लिया था। उन्होंने यह भी कहा कि वह अपनी पसंद के धर्म का पालन करना चाहते हैं और चांदनी कुरैशी के साथ वैवाहिक संबंध को लेकर भी उनकी अपनी इच्छा है। कोर्ट के सामने उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें 4 जून 2026 से घर में रहने के लिए मजबूर किया गया था। 

इस मामले में 6 जून को आयुष के पिता की शिकायत पर पुलिस ने चांदनी कुरैशी, उनके पिता और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। बाद में मामला हाईकोर्ट पहुंचा। अब न्यायालय का फैसला सामने है।

दूसरी ओर, आयुष के पिता ने उनके दावे से असहमति जताई। पिता की ओर से कहा गया कि आयुष को प्रभावित या ‘ब्रेनवॉश’ किया गया था और उनका धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से नहीं हुआ। उन्होंने बेटे के इस्लाम अपनाने तथा चांदनी से शादी के फैसले का विरोध किया। 

लेकिन अदालत के सामने आयुष के स्पष्ट बयान के बाद पीठ ने कहा कि ऐसा कोई आधार सामने नहीं आया जिससे उनके बयान पर अविश्वास किया जा सके। अदालत ने माना कि बालिग व्यक्ति सामान्य तौर पर अपनी अंतरात्मा के अनुसार धर्म तय करने का अधिकार रखता है। केवल इसलिए कि परिवार को उसका फैसला पसंद नहीं है, उसकी पसंद को दबाया नहीं जा सकता। 

जीवनसाथी के चुनाव को लेकर भी अदालत ने व्यक्तिगत स्वायत्तता पर जोर दिया। कोर्ट के अनुसार, किसी वयस्क का यह तय करना कि वह किस व्यक्ति से शादी करना चाहता है, उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। परिवार की असहमति अपने आप में किसी बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकती। 

इसके बाद हाईकोर्ट ने आयुष को अपनी पसंद की जगह पर और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता दी। अदालत ने उन्हें अपनी पसंद का धर्म अपनाने और उसका पालन करने की भी अनुमति दी। साथ ही, उनके वैवाहिक संबंध को लेकर कानून के मुताबिक उचित फैसला लेने की स्वतंत्रता दी। 

यह फैसला केवल एक परिवार के विवाद तक सीमित नहीं है। हर मामले के तथ्य अलग होते हैं और लागू कानूनों तथा परिस्थितियों की जांच जरूरी रहती है।

आयुष मलिक का मामला भी इसी वजह से महत्वपूर्ण है। यहां अदालत ने उस वयस्क व्यक्ति के अदालत के सामने दिए गए स्पष्ट बयान और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केंद्र में रखा। अब इस मामले से जुड़ी आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया पर नजर रहेगी।

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आयुष मलिक को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत, धर्म और जीवनसाथी चुनने की आजादी पर अहम टिप्पणी

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शामली के 31 वर्षीय आयुष मलिक को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुक्त किया। कोर्ट ने वयस्क की धार्मिक स्वतंत्रता और जीवनसाथी चुनने के अधिकार पर अहम टिप्पणी की।

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