नई दिल्ली: फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा से जुड़े एक मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट का फैसला एक बार फिर चर्चा में है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने 25 अगस्त 2026 को 12 आरोपियों को हत्या, दंगा, आगजनी, डकैती, गैरकानूनी जमावड़े और अन्य गंभीर आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।
यह मामला गोकुलपुरी इलाके में फरवरी 2020 की हिंसा के दौरान मुरसलीन की मौत से भी जुड़ा था। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने आरोपियों के खिलाफ कई गंभीर धाराओं में कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन अदालत के सामने पेश साक्ष्यों और गवाहों की गवाही से आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी।
अदालत ने किस आधार पर दिया फैसला?
कोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति की किसी भीड़ में मौजूदगी मात्र से उसे गंभीर आपराधिक अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन को यह साबित करना होता है कि संबंधित आरोपी ने वास्तव में क्या किया, उसकी भूमिका क्या थी और उसके खिलाफ लगाए गए प्रत्येक आरोप को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद हैं।
अदालत के मुताबिक, आरोपियों के खिलाफ घातक हथियार रखने या हिंसा में व्यक्तिगत भूमिका निभाने से जुड़ा पर्याप्त प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था। इसलिए गैरकानूनी जमावड़े और दंगे से संबंधित आरोपों को साबित करने में अभियोजन पक्ष असफल रहा।
मुरसलीन की मौत का मामला भी नहीं हो सका साबित
इस मामले का सबसे संवेदनशील हिस्सा मुरसलीन की मौत से जुड़ा था। पुलिस को 28 फरवरी 2020 को गोकुलपुरी थाना क्षेत्र में जोहरीपुर तिराहे के पास नाले में एक शव मिलने की सूचना मिली थी। शव को जीटीबी अस्पताल भेजा गया और बाद में पोस्टमार्टम कराया गया।
मुरसलीन की पत्नी नरगिस ने 1 मार्च को उनके लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। 12 मार्च को उन्होंने बरामद शव की पहचान अपने पति के रूप में की। अभियोजन का दावा था कि मुरसलीन की मौत दंगाई भीड़ की हिंसा के दौरान हुई थी।
लेकिन मुकदमे के दौरान जिन लोगों को हत्या का प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था, उनमें से किसी ने भी अदालत में अभियोजन की कहानी की पुष्टि नहीं की। अदालत ने इसी पहलू को गंभीरता से लिया और कहा कि हत्या का आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष या विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
12 आरोपियों को राहत, लेकिन एक आरोपी को अलग मामले में दोषी माना गया
अदालत ने लोक ेश सोलंकी, पंकज शर्मा, अंकित चौधरी उर्फ फौजी, प्रिंस उर्फ डीजे वाला, जतिन शर्मा उर्फ रोहित, हिमांशु ठाकुर, विवेक पंचाल उर्फ नंदू, ऋषभ चौधरी उर्फ तपस, सुमित चौधरी उर्फ बादशाह, टिंकू अरोड़ा, संदीप उर्फ मोगली और साहिल उर्फ बाबू को हत्या, दंगा, आगजनी, डकैती और अन्य प्रमुख आरोपों से बरी किया।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। हिमांशु ठाकुर को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी नहीं किया गया। अदालत ने उसे चोरी की संपत्ति रखने के अपराध में भारतीय दंड संहिता की धारा 411 के तहत दोषी माना। यानी 12 आरोपियों को गंभीर आरोपों में राहत मिली, लेकिन उनमें से एक आरोपी के खिलाफ एक अलग अपराध साबित हुआ।
फैसला क्या संदेश देता है?
यह फैसला दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण पहलू को सामने रखता है—गंभीर आरोपों के बावजूद अदालत में दोष साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं।
2020 की हिंसा ने दिल्ली के कई परिवारों को प्रभावित किया था। इसलिए ऐसे मामलों में एक तरफ पीड़ित परिवारों को न्याय मिलने की उम्मीद महत्वपूर्ण है, तो दूसरी तरफ जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, उनके खिलाफ भी कानून के मुताबिक प्रमाणित साक्ष्य होना जरूरी है।
कड़कड़डूमा कोर्ट का यह फैसला इसी मूल सिद्धांत को दोहराता है कि आरोप और दोषसिद्धि एक ही चीज नहीं हैं। अदालत में अंतिम फैसला उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर होता है।
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Delhi Riots Case: कड़कड़डूमा कोर्ट ने 12 आरोपियों को किया बरी, मुरसलीन हत्या मामले में सबूतों की कमी
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दिल्ली दंगा मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने 12 आरोपियों को हत्या, दंगा, आगजनी और डकैती समेत गंभीर आरोपों से बरी किया। अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
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