नई दिल्ली। भारत की ऊर्जा जरूरतों और बढ़ते प्रदूषण के बीच केंद्र सरकार ने अब पेट्रोल के साथ-साथ गैस क्षेत्र में भी वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹23,731 करोड़ के परिव्यय वाली GOBARdhan योजना को मंजूरी दी है। इसका मकसद कृषि अवशेष, पशुओं का गोबर, गन्ने की खोई, शहरों के जैविक कचरे और दूसरे बायोमास से Compressed Bio-Gas यानी CBG तैयार करना है।
सरकार की इस पहल को सिर्फ ऊर्जा नीति के तौर पर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे गांव, किसान, कचरा प्रबंधन और देश की ऊर्जा सुरक्षा—इन सभी को एक साथ जोड़ने की कोशिश है।
गोबर और पराली से बनेगी गैस, किसानों को भी मिल सकता है फायदा
GOBARdhan का मूल विचार काफी सीधा है—जिस जैविक कचरे को अक्सर समस्या माना जाता है, उसे ऊर्जा और आर्थिक संसाधन में बदला जाए। पशुओं का गोबर, फसल कटने के बाद बचा अवशेष, गन्ने की खोई और शहरों का जैविक कचरा बायोगैस उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रक्रिया से निकलने वाली गैस को शुद्ध करके Compressed Bio-Gas (CBG) के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
सरकार पहले से GOBARdhan पहल के जरिए जैविक कचरे को बायोगैस और बायो-स्लरी में बदलने पर काम कर रही है। मार्च 2026 में सरकार ने बताया था कि योजना के तहत गांवों में सामुदायिक और क्लस्टर आधारित बायोगैस संयंत्रों को सहायता दी जा रही है।
अब नई व्यवस्था इस क्षेत्र को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने की कोशिश है।
CNG गाड़ियों के लिए क्या बदलेगा?
CBG और पारंपरिक प्राकृतिक गैस से बनी CNG में उपयोग की दृष्टि से समानताएं हैं। इसलिए आने वाले समय में Compressed Bio-Gas को CNG और पाइप्ड गैस नेटवर्क में शामिल करने की दिशा में काम किया जा सकता है। इससे परिवहन और घरेलू ऊर्जा क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने की संभावना है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि कल से हर CNG पंप पर पूरी तरह बायोगैस मिलने लगेगी। इसके लिए उत्पादन संयंत्र, गैस शुद्धीकरण, परिवहन, पाइपलाइन और खरीद व्यवस्था जैसी पूरी सप्लाई चेन तैयार करनी होगी।
असली चुनौती जमीन पर अमल की
योजना का आंकड़ा बड़ा है, लेकिन असली परीक्षा इसके क्रियान्वयन की होगी। देश में बड़ी मात्रा में जैविक कचरा उपलब्ध है, मगर उसे गांवों और खेतों से इकट्ठा करके संयंत्र तक पहुंचाना अपने आप में बड़ी चुनौती है।
सरकारी GOBARdhan पोर्टल पर वर्तमान में बड़ी संख्या में CBG और बायोगैस परियोजनाएं पंजीकृत हैं, लेकिन उनमें से सभी अभी चालू नहीं हैं। इससे साफ है कि नीति बनाने के साथ-साथ परियोजनाओं को जमीन पर उतारना भी उतना ही जरूरी है।
‘कचरे’ से कमाई तक की कहानी
अगर योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो इसका सबसे दिलचस्प पहलू यह हो सकता है कि गांव का कचरा ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संसाधन बन जाए। किसानों और स्थानीय समुदायों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर, जैविक खाद की उपलब्धता और रोजगार पैदा होने की संभावना है। सरकार भी GOBARdhan को ग्रामीण आय, रोजगार और स्वच्छता से जोड़कर देखती है।
यानी पेट्रोल में इथेनॉल के बाद ऊर्जा के मोर्चे पर अगली बड़ी कहानी गोबर, पराली और जैविक कचरे से गैस की हो सकती है।
NAYAK नजरिया: किसी भी बड़ी सरकारी योजना की सफलता उसके बजट से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसका फायदा खेत, गांव और आम उपभोक्ता तक कितनी ईमानदारी से पहुंचता है। GOBARdhan के सामने भी यही सबसे बड़ी चुनौती है—**कचरे को संपत्ति में बदलने का सपना कागज से निकलकर जमीन पर कब और कितना दिखाई देता है।**
إرسال تعليق