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झारखंड छात्र आंदोलन की आवाज बनीं उम्मे हबीबा: भूख हड़ताल से परीक्षा रद्द होने तक, जानिए पूरी कहानी


रांची। झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन आखिरकार एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक फैसले तक पहुंचा। इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल उम्मे हबीबा ने लंबे समय तक छात्रों की मांगों को लेकर आवाज उठाई और भूख हड़ताल भी की। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। आंदोलन के बीच हबीबा की तस्वीर और उनके बयान सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बने।

झारखंड के बोकारो जिले के कसमार की रहने वाली उम्मे हबीबा ने JPSC और JSSC से जुड़ी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक उन्होंने JPSC की 7वीं, 11वीं और 14वीं परीक्षाएं दी हैं। उन्होंने अंग्रेजी में पोस्ट ग्रेजुएशन और B.Ed. की पढ़ाई पूरी की है।

‘लड़ाई सत्ता से नहीं, सिस्टम से है’

आंदोलन के दौरान हबीबा ने छात्रों की समस्या को केवल परीक्षा विवाद तक सीमित नहीं बताया। उनका कहना था कि लड़ाई किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ है जिसमें युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

भूख हड़ताल के दौरान उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई। 13 दिन के अनशन के दौरान उनका वजन करीब 8 किलो कम होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।

हबीबा ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से भी छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की थी। उनका कहना था कि सरकार से छात्रों को उम्मीद है और व्यवस्था में सुधार होने से राज्य के युवाओं का भविष्य बेहतर हो सकता है।

राहुल गांधी से भी हुई थी बातचीत

झारखंड छात्र आंदोलन को कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का भी समर्थन मिला। आंदोलन के दौरान राहुल गांधी ने छात्रों से वीडियो कॉल के माध्यम से बातचीत की और उनकी समस्याओं को सुना।

यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि आंदोलन केवल रांची तक सीमित मुद्दा नहीं रहा, बल्कि भर्ती परीक्षाओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल के रूप में राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया।

सरकार के फैसले के बाद खत्म हुआ हबीबा का अनशन

18 अगस्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने और TDPL एजेंसी द्वारा आयोजित परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा की गई। इसके बाद उम्मे हबीबा समेत कुछ अन्य आंदोलनकारी छात्रों ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। रांची सदर अस्पताल में मंत्री दीपिका पांडे सिंह और स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी की मौजूदगी में हबीबा ने भूख हड़ताल खत्म की।

हालांकि, यह कहना कि आंदोलन से जुड़ी हर मांग पूरी हो चुकी है, अभी पूरी तरह सही नहीं होगा। बाद की रिपोर्टों में भी कुछ छात्र समूहों द्वारा जांच और दूसरी मांगों को लेकर आंदोलन जारी रखने की बात सामने आई है।

हबीबा ने अनशन खत्म करते समय सरकार से छात्रों पर दर्ज मामलों को वापस लेने और अन्य मांगों पर भी कार्रवाई की अपील की।

राजनीतिक चश्मे से नहीं, युवाओं के सवाल से देखें

हबीबा के आंदोलन को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी स्वाभाविक हैं। सोशल मीडिया पर कुछ लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर यही आंदोलन किसी दूसरी सरकार के खिलाफ होता तो राजनीतिक भाषा अलग होती। लेकिन इस बहस से अलग एक सवाल सबसे अहम है—क्या झारखंड के युवाओं को पारदर्शी, निष्पक्ष और भरोसेमंद भर्ती व्यवस्था मिलेगी?

किसी छात्र आंदोलन का मूल्यांकन उसके राजनीतिक समर्थन से नहीं, बल्कि उसकी मांगों और सरकार द्वारा किए गए फैसलों से होना चाहिए। उम्मे हबीबा की कहानी इसी सवाल को सामने रखती है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और युवाओं के भरोसे को आखिर कैसे मजबूत किया जाए।

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