NAYAK | भारतीय नायक
नई दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आयोजित एक स्कूली कार्यक्रम अचानक राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया। दिल्ली के सरदार पटेल विद्यालय में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एमेरिटा ज़ोया हसन को छात्रों को ‘बहुलतावाद’ यानी Pluralism पर संबोधित करना था। लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से ठीक पहले उनका संबोधन रद्द कर दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, स्कूल के बाहर विरोध के बाद पुलिस ने सुरक्षा संबंधी चिंता जताई थी।
मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यह कार्यक्रम देश के स्वतंत्रता दिवस से जुड़ा था और जिस विषय पर ज़ोया हसन को बोलना था, वह भारतीय लोकतंत्र की विविधता से सीधे जुड़ा हुआ है।
विरोध के बाद बदला कार्यक्रम
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 14 अगस्त को सरदार पटेल विद्यालय के लोदी एस्टेट परिसर में स्वतंत्रता दिवस और छात्रवृत्ति पुरस्कार समारोह आयोजित होना था। ज़ोया हसन को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था। उन्हें ध्वजारोहण के बाद छात्रों को संबोधित करना था।
कार्यक्रम से कुछ समय पहले स्कूल के बाहर करीब 10-15 लोगों के जमा होने की बात सामने आई। कुछ रिपोर्टों में इन लोगों को विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़ा बताया गया है, हालांकि पुलिस की ओर से प्रदर्शनकारियों की पहचान या संबद्धता की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
इसके बाद पुलिस की मौजूदगी बढ़ाई गई और सुरक्षा को लेकर आयोजकों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई। अंततः ज़ोया हसन का संबोधन कार्यक्रम से हटा दिया गया। बाद में एक पूर्व छात्र ने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि की भूमिका निभाई।
‘बहुलतावाद’ पर ही क्यों मचा विवाद?
ज़ोया हसन भारतीय राजनीति और समाज पर लंबे समय से शोध करने वाली जानी-मानी अकादमिक हैं। उनका अकादमिक काम राज्य, राजनीतिक दलों, अल्पसंख्यकों, जातीयता, लैंगिक सवालों और उत्तर भारत के सामाजिक-राजनीतिक बदलाव जैसे विषयों से जुड़ा रहा है। वह जेएनयू के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज की डीन भी रह चुकी हैं।
ऐसे में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उनका छात्रों से बहुलतावाद पर संवाद करना अपने आप में कोई असामान्य बात नहीं थी। लेकिन कार्यक्रम रद्द होने के बाद सवाल यह खड़ा हो गया कि क्या किसी वक्ता के विचारों से असहमति जताने का जवाब कार्यक्रम रोक देना होना चाहिए?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्कूल और विश्वविद्यालय सिर्फ किताबों और परीक्षाओं की जगह नहीं होते। ये वे स्थान हैं जहां युवा अलग-अलग विचार सुनते हैं, सवाल पूछते हैं और अपनी राय बनाते हैं।
पुलिस ने बताया सुरक्षा का मामला
पुलिस की ओर से सामने आए पक्ष में कार्रवाई को एहतियाती बताया गया है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, संभावित विरोध की सूचना मिलने के बाद छात्रों और कर्मचारियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय पुलिस तैनात की गई थी और आयोजकों को आवश्यक सावधानी बरतने की सलाह दी गई। घटना के दौरान हिंसा या संपत्ति को नुकसान पहुंचने की कोई रिपोर्ट नहीं है।
वहीं, कुछ शिक्षाविदों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने कार्यक्रम रद्द किए जाने पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि अगर कुछ लोग किसी वक्ता के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे तो सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करके कार्यक्रम कराया जा सकता था।
स्वतंत्रता दिवस और बहुलतावाद का सवाल
इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू शायद यही है कि स्वतंत्रता दिवस के मंच पर जिस विषय पर छात्रों से संवाद होना था, उसी संवाद को रोक दिया गया।
भारत की पहचान लंबे समय से भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों और अलग-अलग सामाजिक परंपराओं की विविधता से जुड़ी रही है। ऐसे देश में बहुलतावाद केवल राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सामाजिक वास्तविकता भी है।
इस घटना ने एक बार फिर यह बहस सामने ला दी है कि बच्चों और युवाओं को लोकतंत्र में असहमति से कैसे परिचित कराया जाए। क्या उन्हें केवल एक जैसी राय सुनाई जाए, या अलग-अलग विचारों को सुनकर खुद निष्कर्ष निकालने का अवसर दिया जाए?
सवाल ज़ोया हसन के भाषण से कहीं बड़ा है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में असहमति का जवाब संवाद से दिया जाएगा या दबाव से?
स्वतंत्रता दिवस हमें राजनीतिक आजादी की याद दिलाता है, लेकिन लोकतांत्रिक समाज की असली ताकत तब दिखाई देती है जब अलग विचार रखने वाले लोगों को भी अपनी बात कहने और दूसरों को उसे सुनने का अवसर मिलता है।
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स्रोत: citeturn0search7turn0search0turn0news3
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