Top News

₹54,282 करोड़ का हिसाब लंबित: CAG रिपोर्ट ने सरकारी खर्च की पारदर्शिता पर उठाए गंभीर सवाल


नई दिल्ली। सरकारी योजनाओं के लिए जारी होने वाला पैसा सिर्फ बजट की किताबों में दर्ज रकम नहीं होता, वह आम लोगों के टैक्स से जुटाया गया सार्वजनिक धन होता है। ऐसे में जब हजारों करोड़ रुपये के खर्च का उपयोग प्रमाणित करने वाले दस्तावेज वर्षों तक लंबित रहें, तो सवाल सिर्फ कागजी कार्रवाई का नहीं, बल्कि जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता का भी बन जाता है।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की वर्ष 2024-25 की यूनियन सरकार के खातों से जुड़ी रिपोर्ट में ऐसा ही एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2025 तक केंद्र के 15 मंत्रालयों और विभागों से जुड़े 33,973 उपयोगिता प्रमाणपत्र (Utilisation Certificates) लंबित थे। इन प्रमाणपत्रों में कुल ₹54,282.32 करोड़ की राशि शामिल थी।

क्या होता है उपयोगिता प्रमाणपत्र?

सरल भाषा में समझें तो सरकार जब किसी संस्था या संगठन को किसी निर्धारित उद्देश्य के लिए अनुदान देती है, तो बाद में यह प्रमाणित किया जाना चाहिए कि पैसा उसी काम में खर्च हुआ जिसके लिए उसे मंजूर किया गया था।

इसी प्रक्रिया में उपयोगिता प्रमाणपत्र महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। CAG की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य वित्तीय नियम यानी GFR 2017 के नियम 238 के तहत ऐसे प्रमाणपत्र निर्धारित समय में जमा किए जाने चाहिए। नियमों के मुताबिक, प्रमाणपत्र उपलब्ध न होने की स्थिति में संबंधित संस्थान को भविष्य की सरकारी सहायता से वंचित करने जैसी कार्रवाई भी की जा सकती है।

लेकिन यहां तस्वीर कुछ और है।

सबसे चौंकाने वाली बात: मामला सिर्फ हाल का नहीं

CAG के आंकड़ों के मुताबिक लंबित प्रमाणपत्रों में से 13,926 यूसी करीब ₹38,287.52 करोड़ की राशि से जुड़े हैं और ये वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2023-24 के बीच के हैं।

इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि लंबित मामलों में सबसे पुराने अनुदान वित्तीय वर्ष 1985-86 तक के हैं। यानी कुछ मामलों में सरकारी धन के इस्तेमाल का औपचारिक हिसाब दशकों बाद भी रिकॉर्ड में पूरा नहीं हुआ है।

सबसे ज्यादा राशि किन विभागों से जुड़ी?

CAG के आंकड़ों में आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय और उच्च शिक्षा विभाग से जुड़ी लंबित राशि प्रमुख रूप से सामने आती है। रिपोर्ट में अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों के लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्रों का विवरण दिया गया है।

यहां एक जरूरी बात समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है—लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्र का अर्थ अपने आप में यह साबित नहीं करता कि ₹54,282 करोड़ का गबन हुआ है। इसका अर्थ यह है कि संबंधित धनराशि के उपयोग का आवश्यक प्रमाणपत्र समय पर उपलब्ध नहीं हुआ है। इसलिए इसे सीधे 'घोटाला' कहना तथ्यों से आगे निकल जाना होगा।

लेकिन सवाल फिर भी गंभीर है।

सवाल सिर्फ पैसे का नहीं, सिस्टम का है

अगर किसी योजना के लिए पैसा जारी किया गया और उसके इस्तेमाल का प्रमाण वर्षों तक लंबित है, तो निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या संबंधित विभागों ने समय पर दस्तावेज मांगे?

क्या जिन संस्थाओं ने प्रमाणपत्र जमा नहीं किए, उनके खिलाफ नियमों के मुताबिक कार्रवाई हुई?

क्या भविष्य में उन्हें फिर सरकारी धन दिया गया?

और सबसे अहम—क्या ऐसी लंबित प्रक्रिया को खत्म करने के लिए कोई प्रभावी समयबद्ध व्यवस्था बनाई गई है?

यही वे सवाल हैं जिन्हें सार्वजनिक वित्त की निगरानी के नजरिए से गंभीरता से देखना जरूरी है।

नायक भारतीय नायक के नजरिए से मुद्दा किसी पार्टी या व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करना भर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से सवाल पूछना है जिसमें जनता का पैसा जाता है। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन सार्वजनिक धन के प्रति जवाबदेही स्थायी होनी चाहिए।

₹54,282.32 करोड़ की लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्र वाली यह CAG रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि सरकारी खर्च की असली कसौटी सिर्फ पैसा जारी करना नहीं, बल्कि उसके सही इस्तेमाल और उसका पारदर्शी हिसाब देना भी है।

SEO Keywords: CAG Report 2026, ₹54282 करोड़, Utilisation Certificates, मोदी सरकार CAG रिपोर्ट, सरकारी खर्च, केंद्र सरकार वित्तीय पारदर्शिता, CAG Audit Report, सरकारी धन का हिसाब, Union Government Accounts 2024-25

Post a Comment

أحدث أقدم

संवाददाता आईडी यहाँ से डाउनलोड करें

NAYAK Bhartiya Nayak

संवाददाता बनेने के लिए

NAYAK Bhartiya Nayak

🎧 LIVE FM RADIO




🔊 Volume