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अमेरिका में इजरायल को सैन्य सहायता रोकने की मांग तेज, मुस्लिम सांसद इल्हान उमर के समर्थन से नई बहस छिड़ी


3.3 अरब डॉलर की अमेरिकी सैन्य सहायता पर सवाल, संसद में आया द्विदलीय प्रस्ताव; इजरायल-गाजा युद्ध के बीच वॉशिंगटन की राजनीति में बढ़ी हलचल

नायक भारतीय नायक | अंतरराष्ट्रीय डेस्क

अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर इजरायल को मिलने वाली सैन्य सहायता बड़ा मुद्दा बन गई है। अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में पेश किए गए एक नए द्विदलीय (Bipartisan) संशोधन ने वॉशिंगटन में तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी है। इस संशोधन का उद्देश्य इजरायल को हर वर्ष मिलने वाली लगभग 3.3 अरब डॉलर (करीब 27 हजार करोड़ रुपये) की अमेरिकी सैन्य सहायता पर रोक लगाने की मांग करना है।

इस प्रस्ताव को लेकर सबसे चर्चित प्रतिक्रिया अमेरिका की पहली मुस्लिम महिलाओं में शामिल डेमोक्रेट सांसद इल्हान उमर की ओर से आई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुलकर इस संशोधन का समर्थन करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि अमेरिका इजरायल को बिना शर्त सैन्य सहायता देना बंद करे।

उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब गाजा में जारी युद्ध, नागरिकों की मौत और मानवीय संकट को लेकर पूरी दुनिया में बहस तेज है। वहीं दूसरी ओर अमेरिका के भीतर भी यह सवाल उठने लगा है कि क्या अमेरिकी करदाताओं के पैसे से इजरायल को लगातार सैन्य सहायता देना उचित है?


इल्हान उमर ने क्या कहा?

डेमोक्रेट सांसद इल्हान उमर ने अपने पोस्ट में लिखा,

"यह अतार्किक है कि हम इस नरसंहारक और रंगभेदी शासन को फंड करना जारी रखें। इस संशोधन के पक्ष में वोट करें।"

उमर का यह बयान बेहद तीखा माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने सीधे तौर पर इजरायली सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके इस बयान के बाद अमेरिकी राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है।

समर्थकों का कहना है कि गाजा में हजारों नागरिकों की मौत के बाद अमेरिका को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए, जबकि विरोधियों का आरोप है कि ऐसे बयान इजरायल की सुरक्षा को कमजोर करते हैं।


किसने पेश किया यह प्रस्ताव?

यह संशोधन दो अलग-अलग राजनीतिक दलों के सांसदों ने मिलकर पेश किया है।

  • रो खन्ना – डेमोक्रेटिक पार्टी के भारतवंशी सांसद
  • थॉमस मैसी – रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ सांसद

अमेरिकी राजनीति में किसी विदेशी नीति के मुद्दे पर दोनों दलों के सांसदों का एक मंच पर आना असामान्य माना जाता है। यही वजह है कि इस प्रस्ताव पर पूरी दुनिया की नजरें टिक गई हैं।


क्या है 3.3 अरब डॉलर की सैन्य सहायता?

अमेरिका और इजरायल के बीच वर्षों पुराना रक्षा सहयोग समझौता है।

इसी समझौते के तहत अमेरिका हर साल इजरायल को लगभग 3.3 अरब डॉलर की Foreign Military Financing (FMF) सहायता देता है।

इस धनराशि का उपयोग इजरायल—

  • आधुनिक हथियार खरीदने,
  • मिसाइल रक्षा प्रणाली मजबूत करने,
  • सैन्य उपकरण विकसित करने,
  • सुरक्षा तकनीक बढ़ाने

में करता है।

इजरायल अमेरिका का सबसे करीबी रणनीतिक सहयोगी माना जाता है।


आखिर क्यों उठी सहायता रोकने की मांग?

गाजा में युद्ध शुरू होने के बाद लगातार बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत हुई है।

संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने—

  • मानवीय संकट,
  • अस्पतालों पर दबाव,
  • खाद्य संकट,
  • विस्थापन

को लेकर चिंता जताई है।

इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका के कई सांसदों का कहना है कि जब तक मानवीय कानूनों का पालन सुनिश्चित नहीं होता, तब तक बिना शर्त सैन्य सहायता जारी रखना उचित नहीं होगा।


समर्थन करने वालों की दलील

इस प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का कहना है कि—

  • अमेरिकी करदाताओं का पैसा जिम्मेदारी से खर्च होना चाहिए।
  • सैन्य सहायता मानवाधिकारों से जुड़ी शर्तों के साथ दी जानी चाहिए।
  • गाजा में नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
  • अमेरिका को शांति स्थापित करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

उनका तर्क है कि यदि अमेरिका वास्तव में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बात करता है, तो उसे अपने सहयोगियों के लिए भी समान मानक अपनाने चाहिए।


विरोध करने वालों की राय

दूसरी ओर बड़ी संख्या में सांसद इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं।

उनका कहना है कि—

  • इजरायल आतंकवादी संगठनों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है।
  • अमेरिका का सबसे भरोसेमंद सहयोगी इजरायल है।
  • सैन्य सहायता रोकने से पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है।
  • इससे ईरान समर्थित संगठनों को फायदा मिलेगा।

रिपब्लिकन पार्टी के कई नेताओं ने कहा है कि इजरायल की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।


ट्रंप और रिपब्लिकन खेमे की स्थिति

हालांकि इस संशोधन के सह-प्रस्तावक रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी हैं, लेकिन रिपब्लिकन पार्टी का बड़ा हिस्सा अभी भी इजरायल के पक्ष में मजबूती से खड़ा दिखाई देता है।

पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कई अवसरों पर इजरायल के समर्थन में बयान दे चुके हैं।

ऐसे में माना जा रहा है कि यह प्रस्ताव कांग्रेस में आसान रास्ता तय नहीं करेगा।


रो खन्ना की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?

भारतवंशी सांसद रो खन्ना लंबे समय से अमेरिकी विदेश नीति में संतुलन की वकालत करते रहे हैं।

उनका कहना है कि—

  • अमेरिका को अपने सहयोगियों का समर्थन करना चाहिए,
  • लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानवाधिकारों का भी सम्मान सुनिश्चित करना चाहिए।

उनकी भागीदारी ने इस प्रस्ताव को और अधिक चर्चा में ला दिया है।


गाजा युद्ध ने बदल दी अमेरिकी राजनीति

विश्लेषकों का मानना है कि गाजा युद्ध ने अमेरिकी राजनीति को पहले से अधिक विभाजित कर दिया है।

पहले जहां इजरायल को समर्थन लगभग सर्वसम्मति से मिलता था, वहीं अब—

  • डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रगतिशील सांसद,
  • मानवाधिकार संगठन,
  • विश्वविद्यालयों के छात्र,
  • सामाजिक संगठन

खुले तौर पर युद्धविराम और सैन्य सहायता की समीक्षा की मांग कर रहे हैं।


युवाओं का बदलता नजरिया

हाल के महीनों में अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए।

इन प्रदर्शनों में छात्रों ने—

  • युद्धविराम,
  • फिलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा,
  • सैन्य सहायता रोकने

की मांग उठाई।

युवा मतदाताओं के इस रुख का असर आगामी चुनावों पर भी पड़ सकता है।


क्या यह प्रस्ताव पास हो जाएगा?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल इस संशोधन के पारित होने की संभावना सीमित दिखाई देती है।

क्योंकि—

  • कांग्रेस में इजरायल समर्थक सांसदों की संख्या अभी भी अधिक है।
  • अमेरिकी प्रशासन भी इजरायल को रणनीतिक साझेदार मानता है।
  • रक्षा और सुरक्षा से जुड़े कई समूह सैन्य सहायता जारी रखने के पक्ष में हैं।

फिर भी इस प्रस्ताव ने अमेरिकी विदेश नीति पर नई बहस जरूर शुरू कर दी है।


भारत पर क्या असर?

भारत लंबे समय से—

  • इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध,
  • फिलिस्तीन के साथ ऐतिहासिक समर्थन

दोनों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाता रहा है।

भारत दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) का समर्थन करता है और हिंसा समाप्त कर बातचीत से समाधान निकालने की बात कहता है।

इसलिए अमेरिका में चल रही यह बहस भारत सहित पूरे पश्चिम एशिया की कूटनीति पर नजर रखने वाले देशों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

यूरोप के कई देशों में भी गाजा युद्ध को लेकर मतभेद देखने को मिले हैं।

कुछ देशों ने—

  • युद्धविराम की मांग की,
  • मानवीय सहायता बढ़ाने पर जोर दिया,
  • जबकि कुछ ने इजरायल की सुरक्षा को प्राथमिकता बताया।

संयुक्त राष्ट्र में भी कई प्रस्तावों पर व्यापक चर्चा हो चुकी है।


निष्कर्ष

अमेरिकी कांग्रेस में इजरायल को मिलने वाली 3.3 अरब डॉलर की सैन्य सहायता पर रोक लगाने की मांग केवल एक वित्तीय प्रस्ताव नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की विदेश नीति, मानवाधिकारों और पश्चिम एशिया में उसकी भूमिका पर गहरे सवाल भी खड़े करती है।

इल्हान उमर जैसे सांसदों का खुला समर्थन इस बात का संकेत है कि अमेरिकी राजनीति के भीतर अब इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर पहले जैसी एकरूपता नहीं रही। वहीं रो खन्ना और थॉमस मैसी जैसे अलग-अलग दलों के नेताओं का एक साथ आना भी इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है।

हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह संशोधन कांग्रेस से पारित होगा या नहीं, लेकिन इतना तय है कि इसने अमेरिका में इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता, मानवाधिकारों और वैश्विक कूटनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में कांग्रेस की चर्चा और मतदान यह तय करेंगे कि अमेरिका अपनी पारंपरिक नीति पर कायम रहता है या बदलते वैश्विक और घरेलू दबावों के बीच कोई नया रास्ता अपनाता है।

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