नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयानों में हिंदू-मुस्लिम एकता, सामाजिक समरसता और विविधता को लेकर दिए गए संदेशों के बीच स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़ा विवाद चर्चा में है। खासकर इसलिए क्योंकि एक ओर भागवत सार्वजनिक मंचों से किसी भी समुदाय को भारत से बाहर रखने की सोच को हिंदुत्व की भावना के विपरीत बताते हैं, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पर सक्रिय एक हिंदुत्व समर्थक के विवादित बयानों ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है।
हाल ही में न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। उन्होंने धर्मों की विविधता के बीच मानवता की एकता पर जोर दिया। भागवत ने अपने 2018 के दिल्ली कार्यक्रम का भी संदर्भ दिया, जब उनसे मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पूछा था कि ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा में उनका क्या स्थान होगा। भागवत के मुताबिक, उन्होंने तब भी कहा था कि मुसलमानों को बाहर करना हिंदुत्व नहीं है।
यही वजह है कि अब स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़ा विवाद सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चा में जगह बना रहा है। एक वायरल पॉडकास्ट क्लिप में भारद्वाज ने जंतर-मंतर पर हुए विवाद के संदर्भ में निशु आजाद के पिता संजय कुमार के साथ मारपीट का दावा किया। इस बयान के बाद मामले ने तूल पकड़ा और दिल्ली पुलिस से कार्रवाई की मांग तेज हुई। हालांकि, पुलिस ने संजय कुमार की चोट को लेकर वायरल दावों के कुछ हिस्सों को गलत बताते हुए कहा था कि मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर चोट के दावे की पुष्टि नहीं हुई।
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भारद्वाज ने बाद में अपने पक्ष में आत्मरक्षा का तर्क दिया। एक बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर उन्होंने बचाव नहीं किया होता तो उनके खिलाफ भीड़ हिंसा की स्थिति बन सकती थी। इसलिए पूरे घटनाक्रम में दोनों पक्षों के दावों और उपलब्ध साक्ष्यों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
मामला केवल बयानबाजी तक नहीं रुका। 4 सितंबर को दिल्ली पुलिस ने भारद्वाज को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से हिरासत में लिया। यह कार्रवाई उस समय हुई जब जंतर-मंतर की घटना को लेकर प्रदर्शनकारियों ने संसद मार्ग थाने के बाहर कार्रवाई की मांग की थी। मामले में एससी/एसटी कानून से जुड़ी धाराएं भी जोड़े जाने की खबर सामने आई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या किसी संगठन या विचारधारा के शीर्ष नेतृत्व का समावेशी संदेश उसके समर्थकों और कार्यकर्ताओं के व्यवहार में भी दिखाई देता है?
मोहन भागवत की बातों और स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़े विवाद को एक ही तराजू में तौलना उचित नहीं होगा। दोनों के राजनीतिक-संगठनात्मक प्रभाव और भूमिकाएं अलग हैं। लेकिन किसी भी विचारधारा की असली परीक्षा उसके नारों से ज्यादा उसके समर्थकों के सार्वजनिक आचरण में होती है।
RSS अपने शताब्दी वर्ष में सामाजिक समरसता और ‘एकता’ का संदेश दे रहा है। ऐसे समय में विवादित बयानों और हिंसा के आरोपों से जुड़े मामले यह सवाल जरूर सामने लाते हैं कि समावेशी भारत की बात जमीन पर कितनी मजबूती से लागू हो रही है।
SEO Keywords:
मोहन भागवत बयान, स्वतंत्र भारद्वाज विवाद, RSS, हिंदू मुस्लिम एकता, जंतर मंतर विवाद, निशु आजाद, संजय कुमार, दिल्ली पुलिस, हिंदुत्व, भारत में मुस्लिम, RSS शताब्दी वर्ष
Post a Comment