मणिपुर के राहत शिविरों में मौतों का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की गंभीर चिंता का विषय बन गया है। 2023 की हिंसा के बाद विस्थापित लोगों के लिए बनाए गए राहत शिविरों में हुई अप्राकृतिक मौतों को लेकर अदालत ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। जस्टिस गीता मित्तल समिति को मांगी गई जानकारी संतोषजनक तरीके से नहीं दी गई।
17 सितंबर को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने उन 25 अप्राकृतिक मौतों का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिनकी जानकारी समिति ने राज्य सरकार से मांगी थी। अदालत को बताया गया कि इनमें एक मामला कथित यौन उत्पीड़न के बाद हुई मौत से भी जुड़ा है। सीजेआई ने इस जानकारी को बेहद गंभीर और चौंकाने वाला बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव को इन 25 मामलों की विस्तृत जानकारी देने का निर्देश दिया। इसमें मौत का कारण, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और प्रत्येक मामले में की गई कार्रवाई का विवरण शामिल होना चाहिए। सरकार को राहत शिविरों में विस्थापित लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए उठाए गए कदम भी बताने होंगे। अदालत ने यह भी कहा कि शिविरों में रहने वाले लोगों को जरूरी चिकित्सा सुविधाएं और रोजमर्रा की आवश्यक चीजें उपलब्ध होनी चाहिए।
मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल पोस्टमार्टम को लेकर उठा। अदालत के सामने रखी गई जानकारी के अनुसार, राहत शिविरों में कुल 640 मौतों का रिकॉर्ड सामने आया है, जबकि पोस्टमार्टम केवल 20 मामलों में किए जाने की बात कही गई। अदालत ने पूछा कि जिन मामलों में मौत असामान्य परिस्थितियों में हुई, वहां जांच की प्रक्रिया पूरी तरह क्यों नहीं अपनाई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे को लेकर भी सवाल उठाया। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ अप्राकृतिक मौतों के मामलों में मृतकों के परिजनों को केवल 20 हजार से 30 हजार रुपये तक की राशि दी गई। अदालत ने राज्य सरकार से इस अंतर और मुआवजे की राशि का आधार स्पष्ट करने को कहा है।
यह मामला सिर्फ आंकड़ों और सरकारी रिपोर्टों तक सीमित नहीं है। राहत शिविरों में रहने वाले लोग पहले ही लंबे समय से विस्थापन, असुरक्षा और अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। ऐसे में मौत की निष्पक्ष जांच और परिवार को जरूरी सहायता मिलना बेहद अहम है।
सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भी सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया है। प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि अप्राकृतिक मौतों के मामलों में एफआईआर दर्ज हो, मौत के वास्तविक कारण का पता लगाया जाए और पहले से दर्ज मामलों की जांच तेजी से आगे बढ़े।
अदालत की नाराज़गी का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि समिति ने जुलाई में राज्य सरकार से जानकारी मांगी थी, लेकिन उपलब्ध कराई गई जानकारी में आवश्यक विवरण नहीं थे। अब मुख्य सचिव को विस्तृत रिपोर्ट देकर यह स्पष्ट करना होगा कि मौतों की जांच किस स्तर तक पहुंची है और राहत शिविरों में भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या व्यवस्था की गई है।
मणिपुर की 2023 की हिंसा के बाद हजारों लोग अपने घरों से विस्थापित हुए। तीन साल बाद भी राहत, पुनर्वास और सुरक्षा से जुड़े सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट की ताजा सुनवाई ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि राहत शिविरों में रह रहे लोगों की जिंदगी और गरिमा की रक्षा के लिए व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
अब निगाहें राज्य सरकार की उस विस्तृत रिपोर्ट पर हैं, जिसमें प्रत्येक मौत की परिस्थितियों, जांच, पोस्टमार्टम और उठाए गए सुरक्षा कदमों की जानकारी अदालत को दी जानी है।
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मणिपुर राहत शिविरों में 25 अप्राकृतिक मौतों पर सुप्रीम कोर्ट नाराज़, मुख्य सचिव से मांगी रिपोर्ट
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मणिपुर के राहत शिविरों में अप्राकृतिक मौतों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। 25 मौतों, पोस्टमार्टम और सुरक्षा व्यवस्था पर अदालत ने सवाल उठाए।
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