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मुस्लिम नहीं रहेंगे तो नफरत की राजनीति कैसे करेगी RSS? मोहन भागवत के बयान ने खड़े किए बड़े सवाल


न्यूयॉर्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ सम्मेलन में हिंदू-मुस्लिम संबंधों और मानवता को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिस पर भारत में राजनीतिक बहस तेज होना तय माना जा रहा है। भागवत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह खुद को हिंदू नहीं कह सकता।

भागवत का संदेश साफ था कि धर्म भले अलग-अलग हों, लेकिन इंसानियत एक है। उन्होंने कहा कि हिंदू होने का मतलब यह मानना भी है कि अलग-अलग रास्ते एक ही ईश्वर तक पहुंचते हैं। उनके मुताबिक हर इंसान की अपनी गरिमा है और इंसानों के बीच भेदभाव नहीं होना चाहिए।

भागवत ने अपने संबोधन में हिंदुत्व को किसी को बाहर रखने वाली विचारधारा नहीं बताया। उन्होंने हरियाणा के चरखी दादरी में 1996 में हुए विमान हादसे का उदाहरण भी दिया और कहा कि उस समय संघ के स्वयंसेवकों ने यह नहीं देखा कि हादसे में प्रभावित लोग किस धर्म के हैं, बल्कि उन्होंने इंसान समझकर मदद की।

यह बयान निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण है। खासकर ऐसे समय में जब भारत की राजनीति में हिंदू-मुस्लिम मुद्दा अक्सर चुनावी बहस का हिस्सा बनता रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर देश की राजनीति से धार्मिक पहचान के आधार पर डर और नफरत को हटाया जाए, तो राजनीतिक दलों के पास जनता के सामने रखने के लिए असली मुद्दे कितने मजबूत हैं?

आलोचकों का सवाल भी इसी जगह से उठता है—अगर मुस्लिम भारत में नहीं रहेंगे, तो फिर नफरत की राजनीति किसके नाम पर होगी? हालांकि यह सवाल राजनीतिक आलोचना के दायरे में है और RSS पर नफरत की राजनीति करने का आरोप एक राजनीतिक आरोप है, जिसे स्थापित तथ्य की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।

भागवत के बयान का दूसरा पहलू भी ध्यान देने लायक है। पिछले वर्षों में भी वह हिंदू-मुस्लिम एकता और भारत में इस्लाम के अस्तित्व को लेकर बयान देते रहे हैं। अगस्त 2025 में उन्होंने कहा था कि भारत में इस्लाम का स्थान हमेशा रहेगा और हिंदू-मुसलमानों को एक ही समाज का हिस्सा बताया था।

लेकिन असली सवाल सिर्फ बयान का नहीं है। सवाल यह है कि क्या ऐसी सोच जमीन पर भी दिखाई देगी? क्या आम मुसलमान को बराबरी, सम्मान और सुरक्षा का वही भरोसा महसूस होगा जिसकी बात मंचों से की जाती है? और क्या राजनीतिक बहस में रोजगार, शिक्षा, महंगाई, स्वास्थ्य और किसानों जैसे मुद्दे धार्मिक ध्रुवीकरण से ऊपर आ पाएंगे?

मोहन भागवत का न्यूयॉर्क वाला बयान इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसमें एक सीधी बात कही गई है—भारत में किसी समुदाय के अस्तित्व को नकारना हिंदुत्व की भावना के खिलाफ है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि इस संदेश का असर केवल विदेश की सभा तक सीमित रहता है या भारत की राजनीतिक और सामाजिक जमीन पर भी दिखाई देता है।

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मोहन भागवत का बड़ा बयान: मुस्लिम नहीं रहेंगे तो हिंदू नहीं? RSS पर उठे नफरत की राजनीति के सवाल

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मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में कहा कि भारत में मुसलमान नहीं होने की सोच रखने वाला व्यक्ति खुद को हिंदू नहीं कह सकता। जानिए उनके बयान के मायने और उठते राजनीतिक सवाल।

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