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चार साल से मां से दूर हैं बच्चे, राजकोट की रेहाना की वीजा गुहार ने उठाए मानवीय सवाल


राजकोट। भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का असर अक्सर सीमा, सुरक्षा और कूटनीति के आंकड़ों में दिखाई देता है, लेकिन इसकी सबसे गहरी चोट उन परिवारों पर पड़ती है जिनके रिश्ते सरहद के दोनों तरफ बंटे हुए हैं। गुजरात के राजकोट के रहने वाले परवेज़ शेख और पाकिस्तान के कराची की रहने वाली उनकी पत्नी रेहाना की कहानी भी ऐसा ही एक मानवीय मामला सामने रखती है।

उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक परवेज़ और रेहाना की शादी 2015 में हुई थी। शादी के बाद रेहाना वीजा और जरूरी दस्तावेजों के साथ भारत आईं और राजकोट में अपने पति के साथ रहने लगीं। दोनों के दो बच्चे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वीजा से जुड़ी समस्या के बाद रेहाना दिसंबर 2022 में पाकिस्तान गई थीं और उसके बाद से वह भारत वापस नहीं आ सकीं। परिवार का कहना है कि वह करीब तीन साल से अपने बच्चों से दूर हैं।

आज स्थिति यह है कि मां कराची में है, जबकि उसके बच्चे और पति राजकोट में हैं। बच्चों की जिंदगी में मां की मौजूदगी की कमी को किसी सरकारी आंकड़े से नहीं मापा जा सकता। पिता पर बच्चों की जिम्मेदारी है और दूसरी तरफ रेहाना अपने परिवार के पास लौटने की उम्मीद लगाए बैठी हैं।

सवाल सिर्फ वीजा का नहीं, एक परिवार का है

भारत में प्रवेश करने के लिए विदेशी नागरिकों के पास वैध पासपोर्ट और भारतीय वीजा होना जरूरी है। भारत सरकार का आधिकारिक वीजा पोर्टल भी यही नियम बताता है।

लेकिन सवाल यह है कि जब कोई विदेशी नागरिक कानूनी तरीके से भारत में रह चुका हो, भारतीय नागरिक से उसका विवाह हुआ हो और उसके बच्चे भी भारत में हों, तो ऐसे मानवीय मामलों के लिए क्या कोई प्रभावी और पारदर्शी रास्ता नहीं होना चाहिए?

भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव का असर दोनों देशों के आम नागरिकों पर पड़ता रहा है। ऐसे में हर मामले को केवल सुरक्षा या कूटनीतिक नजरिये से देखने के बजाय परिवार और बच्चों के हित को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर दूसरी मिसाल से तुलना

रेहाना के मामले को लेकर सोशल मीडिया पर कुछ लोग पाकिस्तान से अवैध तरीके से भारत आने वाली सीमा हैदर के मामले का उदाहरण दे रहे हैं। सीमा हैदर 2023 में नेपाल के रास्ते अपने बच्चों के साथ भारत आई थीं और बाद में ग्रेटर नोएडा में सचिन मीणा के साथ रहने लगीं। इस मामले में पुलिस ने जांच की थी और दस्तावेज पाकिस्तान दूतावास को भी भेजे गए थे।

इसलिए यह कहना कि सीमा हैदर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, पूरी तरह सही नहीं होगा। उनका मामला अलग कानूनी प्रक्रिया में रहा है और 2025 में भी उनकी स्थिति को लेकर कानूनी सवाल उठते रहे।

फिर भी इन दोनों मामलों की तुलना से एक बड़ा मानवीय सवाल जरूर सामने आता है—क्या अलग-अलग परिस्थितियों में फंसे परिवारों के लिए कानून के साथ मानवीय दृष्टिकोण की भी जगह होनी चाहिए?

PMO से परिवार की उम्मीद

परवेज़ और रेहाना का परिवार चाहता है कि सरकार उनके मामले को मानवीय आधार पर देखे। उनका सबसे बड़ा सवाल यही है कि बच्चों को उनकी मां से मिलने के लिए आखिर कितने साल इंतजार करना पड़ेगा?

भारत की सुरक्षा और कूटनीतिक चिंताएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। लेकिन जहां एक मां अपने बच्चों से हजारों किलोमीटर दूर हो और परिवार लंबे समय से अलग रह रहा हो, वहां मामले की पारदर्शी समीक्षा की उम्मीद करना भी स्वाभाविक है।

रेहाना की कहानी किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष की कहानी नहीं है। यह एक परिवार की कहानी है, जो सरहदों और कागजी प्रक्रियाओं के बीच अपने बिछड़े रिश्ते को फिर से जोड़ने की उम्मीद कर रहा है। अब सवाल यही है—क्या सरकार इस मानवीय मामले पर गौर करेगी?

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