नोएडा/ग्रेटर नोएडा: उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में हाइड्रोजन बसों को लेकर शुरू हुआ प्रयोग फिलहाल शुरुआती उम्मीदों पर खरा उतरता नजर नहीं आया है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना सिटी में करीब एक महीने के ट्रायल की योजना के बजाय हाइड्रोजन बसों का संचालन महज 18 दिनों में रोक दिया गया। ट्रायल के दौरान यात्रियों की कम संख्या और इलेक्ट्रिक बसों की तुलना में ज्यादा परिचालन खर्च को इसके पीछे प्रमुख वजह माना जा रहा है।
हालांकि, हाइड्रोजन बसों का प्रयोग पूरी तरह खत्म करने के बजाय अब इन्हें छोटे शहरी रूट की जगह लंबे रूट पर चलाने की तैयारी की जा रही है। प्रस्तावित योजना के तहत ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच इन बसों के संचालन पर विचार किया जा रहा है। इस संबंध में उच्च स्तर पर बातचीत चलने की जानकारी सामने आई है।
नोएडा एयरपोर्ट से शुरू हुआ था ट्रायल
हाइड्रोजन बसों का यह प्रयोग नोएडा एयरपोर्ट से भी जुड़ा हुआ था। नोएडा एयरपोर्ट का संचालन 15 जून से शुरू हुआ था। इसी मौके पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान अधिकारी कार्यक्रम स्थल से एयरपोर्ट तक हाइड्रोजन बसों से पहुंचे थे। इसके बाद इन बसों को नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना सिटी के अलग-अलग हिस्सों में ट्रायल के तौर पर चलाया गया।
उत्तर प्रदेश में पहली बार हाइड्रोजन आधारित बसों को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में इस्तेमाल करने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना गया था। इसलिए इनके वास्तविक प्रदर्शन, यात्रियों की प्रतिक्रिया, परिचालन लागत और तकनीकी जरूरतों को समझने के लिए ट्रायल रन किया गया।
यात्रियों की संख्या बनी बड़ी चुनौती
ट्रायल के दौरान सामने आई प्रमुख समस्या यात्रियों की संख्या से जुड़ी रही। जिन रूटों पर बसों को चलाया गया, वहां अपेक्षित संख्या में यात्री नहीं मिल सके। किसी भी सार्वजनिक परिवहन सेवा के लिए यात्रियों की पर्याप्त संख्या महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे बस के संचालन की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित होती है।
अगर बस में यात्रियों की संख्या कम हो और उसे चलाने का खर्च ज्यादा हो, तो प्रति यात्री परिचालन लागत बढ़ जाती है। यही स्थिति हाइड्रोजन बसों के ट्रायल में भी चुनौती के रूप में सामने आई।
इलेक्ट्रिक बसों से ज्यादा खर्च ने बढ़ाई चिंता
हाइड्रोजन बसों के सामने दूसरी बड़ी चुनौती परिचालन लागत की रही। ट्रायल के दौरान इन बसों को इलेक्ट्रिक बसों की तुलना में चलाना महंगा बताया गया। ऐसे समय में जब शहरों में इलेक्ट्रिक बसों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, ज्यादा लागत वाली हाइड्रोजन बसों को छोटे और कम यात्री वाले रूट पर चलाना आर्थिक रूप से आसान नहीं है।
यही वजह है कि अब रणनीति में बदलाव की बात सामने आ रही है। छोटे शहरी रूट की बजाय लंबी दूरी के ऐसे मार्ग तलाशे जा रहे हैं, जहां बस की उपयोगिता और यात्रियों की संख्या बेहतर हो सकती है।
ग्रेटर नोएडा से आगरा तक चलाने की तैयारी
अब हाइड्रोजन बसों को ग्रेटर नोएडा से आगरा तक चलाने का प्रस्ताव चर्चा में है। लंबा रूट मिलने से इन बसों के इस्तेमाल का बेहतर आकलन किया जा सकता है। साथ ही यह भी देखा जा सकेगा कि लंबी दूरी पर यात्रियों की संख्या, ईंधन की खपत, संचालन खर्च और समय के लिहाज से हाइड्रोजन तकनीक कितनी व्यावहारिक साबित होती है।
हालांकि, अंतिम निर्णय से पहले संबंधित विभागों और अधिकारियों के स्तर पर बातचीत और तकनीकी आकलन जरूरी होगा।
सवाल यह भी कि हाइड्रोजन बसों का भविष्य क्या?
हाइड्रोजन को भविष्य के स्वच्छ ईंधन विकल्पों में गिना जाता है। पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने और परिवहन क्षेत्र में प्रदूषण घटाने के लिहाज से इस तकनीक को महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन किसी तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए सिर्फ पर्यावरणीय फायदे पर्याप्त नहीं होते। उसकी लागत, ईंधन उपलब्धता, बुनियादी ढांचा, सुरक्षा, रखरखाव और यात्रियों की जरूरतों को भी देखना पड़ता है।
नोएडा में 18 दिन के ट्रायल के बाद सामने आई चुनौतियां इसी व्यापक तस्वीर का हिस्सा हैं। अब ग्रेटर नोएडा-आगरा रूट पर संभावित संचालन यह तय करने में मदद कर सकता है कि उत्तर प्रदेश में हाइड्रोजन बसों के लिए लंबी दूरी के मार्ग ज्यादा कारगर साबित होते हैं या नहीं।
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