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यूपी चुनाव आते ही ऐसे मामले क्यों बढ़ने लगते हैं? हिजाब विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला


प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले ने स्कूल यूनिफॉर्म, धार्मिक स्वतंत्रता और शैक्षणिक संस्थानों के अनुशासन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की एक छात्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें निर्धारित स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हेडस्कार्फ यानी हिजाब पहनने की अनुमति मांगी गई थी। फैसला 21 अगस्त 2026 को सुनाया गया।

मामला प्रयागराज के अतरसुइया स्थित एक निजी, गैर-सहायता प्राप्त CBSE स्कूल की छात्रा से जुड़ा है। छात्रा ने अपनी मां के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने कक्षा 10 तक इसी स्कूल में पढ़ाई की थी और आरोप लगाया था कि पहले उसे सिर पर स्कार्फ पहनने से रोका नहीं गया, लेकिन कक्षा 11 में प्रवेश के दौरान स्कूल ने निर्धारित ड्रेस कोड का पालन करने को कहा। छात्रा चाहती थी कि उसे स्कूल की यूनिफॉर्म के अतिरिक्त हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए।

अदालत ने यूनिफॉर्म को क्यों माना महत्वपूर्ण?

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की पीठ ने कहा कि यदि किसी शिक्षण संस्थान का ड्रेस कोड समान, निष्पक्ष, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन तथा संस्थान की पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से लागू किया गया है, तो निर्धारित यूनिफॉर्म तय करना मुख्य रूप से स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है।

अदालत ने यह भी माना कि यूनिफॉर्म का उद्देश्य केवल कपड़ों का एक जैसा होना नहीं है। इसके पीछे विद्यार्थियों के बीच समानता, अनुशासन और संस्थान की पहचान जैसे पहलू भी जुड़े होते हैं। अदालत के अनुसार, यदि हर विद्यार्थी अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर तय यूनिफॉर्म में अलग-अलग चीजें जोड़ने लगे तो यूनिफॉर्म की मूल अवधारणा प्रभावित हो सकती है।

एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि छात्रा ने पहले की कक्षाओं में स्कार्फ पहनने की बात कही थी। अदालत ने माना कि अतीत में स्कूल द्वारा आपत्ति नहीं किए जाने मात्र से भविष्य में छात्रा को यूनिफॉर्म नीति से अलग रहने का स्थायी कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।

हिजाब को लेकर अदालत की टिप्पणी

याचिका में हेडस्कार्फ को इस्लामी आस्था की आवश्यक धार्मिक प्रथा बताया गया था। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सकी। पीठ ने 2022 के कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया और उसे इस मुद्दे पर प्रभावशाली न्यायिक दृष्टिकोण माना। साथ ही अदालत ने यह भी नोट किया कि सुप्रीम कोर्ट में इस विषय से जुड़ा पिछला फैसला विभाजित रहा था और इस प्रश्न पर कोई अंतिम सर्वसम्मत घोषणा उपलब्ध नहीं है।

इसलिए इस फैसले को यह कहकर समझना उचित नहीं होगा कि अदालत ने हर परिस्थिति में हिजाब पर रोक लगा दी है। फैसला एक खास स्कूल की यूनिफॉर्म नीति और उसके सामने रखे गए तथ्यों से जुड़ा है।

अब सवाल चुनाव का भी है?

फैसले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में यह सवाल उठ सकता है कि “यूपी चुनाव आते ही ऐसे मामले क्यों बढ़ने लगते हैं?” लेकिन केवल चुनाव नजदीक होने और किसी न्यायिक फैसले के सामने आने के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि मामला राजनीतिक उद्देश्य से उठाया गया है।

दरअसल, अदालत में पहुंचा विवाद छात्रा और स्कूल के बीच ड्रेस कोड को लेकर था। न्यायपालिका ने उपलब्ध तथ्यों और कानूनी दलीलों के आधार पर फैसला दिया है। अब राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन इस फैसले को अपने-अपने नजरिए से देख सकते हैं, लेकिन न्यायिक निर्णय को सीधे चुनावी रणनीति बताने के लिए अलग और ठोस प्रमाण जरूरी होंगे।

फिर भी बड़ा सवाल अपनी जगह है—क्या स्कूलों में समान यूनिफॉर्म और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच कोई संतुलन बनाया जा सकता है? और अगर ऐसा संतुलन संभव है तो उसकी सीमा कौन तय करेगा—स्कूल, सरकार या अदालत?

यही सवाल इस फैसले को महज एक स्कूल ड्रेस विवाद से आगे ले जाता है। आने वाले समय में यह मुद्दा शिक्षा, संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन को लेकर व्यापक बहस का हिस्सा बन सकता है।

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