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पत्रकारों को दिल्ली पुलिस की ‘एडवाइजरी’ पर सवाल, यौन दुर्व्यवहार के आरोपों के बीच उठी जवाबदेही की बहस


प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पत्रकारों के लिए जारी किए गए दिशानिर्देशों में पहचान-पत्र, सुरक्षित दूरी और पुलिस के काम में बाधा न डालने की सलाह; प्रेस की स्वतंत्रता और पुलिस की भूमिका पर बहस तेज

दिल्ली में प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों के लिए पुलिस की ओर से जारी एक नई एडवाइजरी ने प्रेस की स्वतंत्रता और सरकारी संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है। दिल्ली पुलिस ने पत्रकारों से प्रदर्शन के दौरान अपना पहचान-पत्र स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने, पुलिस की कार्रवाई में बाधा न डालने और तनावपूर्ण परिस्थितियों में उचित दूरी बनाए रखने की सलाह दी है। यह एडवाइजरी ऐसे समय आई है, जब तीन महिला पत्रकारों ने एक प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पुलिसकर्मियों पर कथित यौन दुर्व्यवहार और मारपीट के आरोप लगाए हैं। दिल्ली पुलिस ने इन शिकायतों को जांच के लिए क्राइम ब्रांच को भेजा है।

‘स्टोरी मायने रखती है, तरीका भी’

5 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पत्रकारों के लिए ‘Ethics of Journalism’ हैशटैग के साथ एक पोस्ट साझा की। इसमें पत्रकारों को वैध पहचान-पत्र साथ रखने और उसे प्रदर्शित करने की सलाह दी गई। पुलिस ने यह भी कहा कि रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों की मौजूदगी से कानून-व्यवस्था संभालने वाले पुलिसकर्मियों के काम में बाधा नहीं आनी चाहिए।

तनावपूर्ण परिस्थितियों में पत्रकारों को सुरक्षित दूरी बनाए रखने और प्रदर्शनकारियों से अपनी अलग पहचान स्पष्ट रखने की बात भी एडवाइजरी में कही गई। पुलिस का तर्क है कि इससे घटनास्थल पर कानून-व्यवस्था संभाल रहे सुरक्षाकर्मियों को पत्रकारों की पहचान करने में मदद मिलेगी।

महिला पत्रकारों की शिकायतों के बाद आया निर्देश

एडवाइजरी का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 3 अक्टूबर को जंतर-मंतर क्षेत्र में प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रही तीन महिला पत्रकारों ने पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। दिल्ली पुलिस ने उनकी शिकायतों को स्वीकार करते हुए मामले को निष्पक्ष जांच के लिए क्राइम ब्रांच को भेजे जाने की जानकारी दी थी।

इसके बाद पत्रकारों ने पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन कर शिकायत पर एफआईआर और कार्रवाई की मांग की थी। इसी घटनाक्रम के बीच पुलिस की ओर से पत्रकारों के आचरण को लेकर एडवाइजरी जारी होने से सवाल उठे कि पहले शिकायतों की जांच और पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए या पत्रकारों को पेशेवर आचरण की सलाह दी जानी चाहिए।

पुलिस की भूमिका पर उठे संवैधानिक सवाल

आलोचना का मुख्य बिंदु यह है कि पुलिस कानून लागू करने वाली संस्था है, जबकि पत्रकारों का काम सरकारी और सार्वजनिक संस्थाओं की गतिविधियों पर निगरानी रखना और उन्हें जनता तक पहुंचाना है। प्रेस की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी है।

हालांकि, इसका अर्थ यह भी नहीं कि पत्रकारों को किसी प्रदर्शन स्थल पर सुरक्षा नियमों की अनदेखी करने की छूट है। वास्तविक खतरे की स्थिति में पुलिस और पत्रकारों के बीच समन्वय जरूरी है। लेकिन ऐसे निर्देशों की सीमा, उनका कानूनी आधार और उन्हें लागू करने का तरीका स्पष्ट होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पत्रकारिता के लिए पहले से मौजूद मानदंड

भारत में पत्रकारिता के पेशेवर आचरण को लेकर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया पहले से ही ‘Norms of Journalistic Conduct’ जारी करता है। इन मानकों का उद्देश्य पत्रकारिता में स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के बीच संतुलन कायम करना है।

यही वजह है कि सवाल केवल यह नहीं है कि पत्रकारों को घटनास्थल पर कैसे काम करना चाहिए। सवाल यह भी है कि जब पत्रकार पुलिस की कार्रवाई को रिकॉर्ड कर रहे हों, तब पुलिस उनकी रिपोर्टिंग को किस सीमा तक नियंत्रित कर सकती है?

फिलहाल महिला पत्रकारों की शिकायतों की जांच जारी है और एडवाइजरी को लेकर भी बहस जारी है। इस पूरे मामले में सबसे जरूरी बात यही है कि आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित हो और पुलिस भी उतनी ही पारदर्शिता के साथ जवाबदेह रहे, जितनी जवाबदेही लोकतंत्र में मीडिया से अपेक्षित की जाती है।

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