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नवरात्रि की परंपरा के नाम पर नवजात से दूर रहे माता-पिता, श्मशान कर्मचारियों ने निभाया अंतिम संस्कार का फर्ज


महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर की घटना ने खड़े किए संवेदना और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े सवाल, नवजात को अंतिम विदाई देने के लिए आगे आए श्मशान कर्मचारी

NAYAK | भारतीय नायक | विशेष रिपोर्ट

छत्रपति संभाजीनगर: महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर से सामने आई एक घटना ने लोगों को भावुक कर दिया है। जिस घर में एक नए सदस्य के आने की उम्मीदें रही होंगी, वहां जन्म के तुरंत बाद नवजात की मौत से दुख का माहौल बन गया। लेकिन इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा बच्चे की मौत के बाद सामने आए घटनाक्रम की हो रही है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नवरात्रि के दौरान प्रचलित पारिवारिक धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए माता-पिता ने नवजात के शव को छूने और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाने से इनकार कर दिया। इसके बाद श्मशान घाट के कर्मचारियों ने आगे आकर बच्चे का अंतिम संस्कार किया।

जन्म के बाद परिवार पर टूटा दुख

रिपोर्टों के अनुसार, यह घटना छत्रपति संभाजीनगर के एक निजी अस्पताल से जुड़ी है, जहां नवजात ने जन्म के कुछ समय बाद दम तोड़ दिया। बच्चे की मौत अपने आप में परिवार के लिए बेहद दुखद घटना थी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने इस मामले को चर्चा का विषय बना दिया।

बताया गया कि परिवार ने नवरात्रि के दौरान निभाई जाने वाली अपनी परंपरा का हवाला दिया। उनका कहना था कि इस अवधि में उनके यहां प्रसूता और नवजात को छूने तथा मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार करने से परहेज किया जाता है। इसी मान्यता के चलते परिजनों ने बच्चे के शव को हाथ लगाने से इनकार कर दिया।

हालांकि, परिवार की धार्मिक मान्यताओं और घटना के पीछे की परिस्थितियों के बारे में सार्वजनिक रूप से पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए मामले को समझते समय सामने आई रिपोर्टों और पुष्टि किए गए तथ्यों के बीच अंतर रखना जरूरी है।

श्मशान कर्मचारियों ने उठाई जिम्मेदारी

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सेंट्रल नाका श्मशान घाट में काम करने वाले देवराज गायकवाड़ और रामेश्वर साबले को बच्चे के अंतिम संस्कार के लिए बुलाया गया। दोनों कर्मचारी अस्पताल पहुंचे और नवजात के शव को श्मशान घाट ले जाकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई।

इस दौरान बच्चे के पिता के व्यवहार को लेकर भी रिपोर्ट सामने आई। बताया गया कि वह अलग ऑटो से श्मशान घाट पहुंचा और अंतिम संस्कार की जगह से कुछ दूरी पर खड़ा रहा। कर्मचारियों के बुलाने के बावजूद वह पास नहीं आया। रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम संस्कार के बाद उसने बच्चे की कब्र पर थोड़ा दूध अर्पित किया और वहां से चला गया।

यह दृश्य देखने वाले कर्मचारियों के लिए भी भावनात्मक रूप से कठिन था। रोजाना अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाने वाले इन लोगों ने एक ऐसे बच्चे को अंतिम विदाई दी, जिसके अपने परिजन उस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल नहीं हुए।

आस्था और संवेदना के बीच सवाल

इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी धार्मिक परंपरा का पालन करते समय मानवीय संवेदनाओं और परिस्थितियों पर भी विचार नहीं किया जाना चाहिए?

भारत में धार्मिक आस्थाएं और पारिवारिक परंपराएं लोगों के जीवन का अहम हिस्सा हैं। हर परिवार की मान्यताएं अलग हो सकती हैं। लेकिन किसी दुखद परिस्थिति में संवेदना, करुणा और मानवीय जिम्मेदारी का महत्व भी कम नहीं होता।

इस घटना को किसी एक धर्म या समुदाय पर टिप्पणी के रूप में देखने के बजाय उस व्यापक सामाजिक सवाल के रूप में देखना जरूरी है, जो यह पूछता है कि परंपराओं की व्याख्या करते समय मानवीय पक्ष को कितनी जगह मिलनी चाहिए।

इंसानियत का फर्ज निभाने वाले कर्मचारी

इस पूरे घटनाक्रम में देवराज गायकवाड़ और रामेश्वर साबले की भूमिका चर्चा में है। उन्होंने कठिन परिस्थिति में आगे आकर उस नवजात का अंतिम संस्कार किया, जिसे अंतिम विदाई देने की जिम्मेदारी परिवार की ओर से नहीं निभाई गई।

एक ओर यह घटना धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक परंपराओं पर सवाल खड़े करती है, तो दूसरी ओर यह भी दिखाती है कि इंसानियत का फर्ज कई बार ऐसे लोग निभाते हैं, जिनका उस परिवार से कोई निजी रिश्ता नहीं होता।

नवजात की मौत एक दुखद घटना थी। उसके बाद सामने आया घटनाक्रम समाज के सामने एक गंभीर सवाल छोड़ गया है—आस्था का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन क्या हर परिस्थिति में मानवीय संवेदना को भी उतनी ही अहमियत नहीं मिलनी चाहिए?


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Chhatrapati Sambhajinagar News: नवरात्रि में नवजात को छूने से माता-पिता का इनकार, श्मशान कर्मचारियों ने किया अंतिम संस्कार

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महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में नवजात की मौत के बाद माता-पिता ने कथित धार्मिक परंपरा का हवाला देकर शव छूने से इनकार किया। श्मशान कर्मचारियों ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाई।

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