नई दिल्ली/इस्लामाबाद:
भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई है। पाकिस्तान ने हाल ही में इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में "सिंधु जल संधि: शांति और क्षेत्रीय स्थिरता का एक साधन" विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया। इस कार्यक्रम में विभिन्न देशों के विशेषज्ञों और पाकिस्तान के कई वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सा लिया। सेमिनार के दौरान पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत पानी को "हथियार" की तरह इस्तेमाल कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की।
दूसरी ओर भारत का स्पष्ट कहना है कि 1960 में हुई सिंधु जल संधि आज की तकनीकी, जलवायु, सुरक्षा और हाइड्रोलॉजिकल परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रह गई है। इसलिए इसमें बदलाव या पुनर्विचार आवश्यक है।
क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस समझौते पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।
इस संधि के तहत छह प्रमुख नदियों का बंटवारा किया गया।
पूर्वी नदियां – रावी, ब्यास और सतलुज भारत के हिस्से में आईं।
पश्चिमी नदियां – सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश जल पाकिस्तान को मिला, हालांकि भारत को सीमित उपयोग का अधिकार दिया गया।
विशेषज्ञों के अनुसार इस समझौते के तहत सिंधु बेसिन के लगभग 80 प्रतिशत जल प्रवाह पर पाकिस्तान का अधिकार सुनिश्चित किया गया, जबकि भारत को लगभग 20 प्रतिशत पानी का उपयोग मिला।
पाकिस्तान ने सेमिनार में क्या कहा?
इस्लामाबाद में आयोजित सेमिनार के दौरान पाकिस्तान के कई नेताओं और विशेषज्ञों ने दावा किया कि भारत पानी को दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। कुछ वक्ताओं ने यह भी कहा कि यदि सिंधु जल संधि कमजोर होती है तो पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह इस मुद्दे पर ध्यान दे और भारत पर संधि का पालन करने के लिए दबाव बनाए।
कुछ वक्ताओं ने तो सिंधु जल संधि को क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु संतुलन से भी जोड़ने की कोशिश की। उनका तर्क था कि यदि जल विवाद बढ़ा तो इसका असर व्यापक क्षेत्रीय तनाव पर पड़ सकता है।
भारत का क्या है पक्ष?
भारत का कहना है कि पाकिस्तान इस मुद्दे को राजनीतिक और कूटनीतिक मंचों पर बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।
भारतीय अधिकारियों का तर्क है कि 1960 में जब यह संधि हुई थी तब:
जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां नहीं थीं।
आबादी वर्तमान की तुलना में काफी कम थी।
ऊर्जा और सिंचाई की आवश्यकताएं सीमित थीं।
आधुनिक जल प्रबंधन तकनीक उपलब्ध नहीं थी।
सीमा पार आतंकवाद जैसी सुरक्षा चुनौतियां वर्तमान स्वरूप में मौजूद नहीं थीं।
भारत का मानना है कि आज की परिस्थितियों में संधि के कई प्रावधान व्यावहारिक नहीं रह गए हैं और उनमें सुधार की आवश्यकता है।
जम्मू-कश्मीर पर क्यों है इसका असर?
सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी नदियां जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से होकर गुजरती हैं।
भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि संधि की शर्तों के कारण वह इन नदियों की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जाए तो:
सिंचाई परियोजनाओं को बढ़ावा मिलेगा।
जलविद्युत उत्पादन में वृद्धि होगी।
स्थानीय कृषि को लाभ मिलेगा।
क्षेत्रीय विकास की नई संभावनाएं खुलेंगी।
इसी कारण भारत वर्षों से संधि के कुछ प्रावधानों पर पुनर्विचार की मांग करता रहा है।
आतंकवाद और जल संधि का संबंध
भारत बार-बार यह दोहराता रहा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।
विश्लेषकों का मानना है कि सीमा पार आतंकवादी घटनाओं के बाद भारत में सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग तेज होती रही है।
भारत का कहना है कि यदि पाकिस्तान लगातार सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देता है तो दोनों देशों के बीच विश्वास का माहौल प्रभावित होता है, जिसका असर द्विपक्षीय समझौतों पर भी पड़ सकता है।
क्या संधि समाप्त हो सकती है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार सिंधु जल संधि एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, इसलिए इसे समाप्त करना आसान नहीं है।
हालांकि किसी भी संधि में परिस्थितियों के बदलने पर समीक्षा या संशोधन की संभावना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मौजूद रहती है।
भारत पहले भी कई बार संधि की समीक्षा और संशोधन की प्रक्रिया शुरू करने की इच्छा जता चुका है।
विश्व बैंक की क्या भूमिका है?
विश्व बैंक इस संधि का पक्षकार नहीं बल्कि फैसिलिटेटर (मध्यस्थ) है।
यदि किसी तकनीकी विवाद पर दोनों देश सहमत नहीं होते तो संधि के तहत:
न्यूट्रल एक्सपर्ट की नियुक्ति,
या अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता (Court of Arbitration)
जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
पाकिस्तान की चिंता क्यों बढ़ी?
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की कृषि और पेयजल व्यवस्था का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है और सिंधु बेसिन उसके लिए जीवनरेखा माना जाता है।
इसी वजह से वह किसी भी संभावित बदलाव को अपने हितों के लिए चुनौती के रूप में देखता है।
भारत की प्राथमिकताएं क्या हैं?
भारत जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर जोर दे रहा है।
सरकार का कहना है कि:
जलविद्युत परियोजनाएं विकसित की जाएंगी।
सिंचाई क्षमता बढ़ाई जाएगी।
आधुनिक जल प्रबंधन तकनीक अपनाई जाएगी।
राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाएगी।
भारत यह भी स्पष्ट कर चुका है कि वह अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान करता है, लेकिन बदलती परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विशेषज्ञों की राय
जल नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में जल संसाधन दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संसाधनों में शामिल होंगे।
जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी और पानी की मांग के कारण दक्षिण एशिया में जल प्रबंधन पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार दोनों देशों को टकराव के बजाय तकनीकी सहयोग और वैज्ञानिक जल प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए।
आगे क्या?
फिलहाल दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत संधि में सुधार और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप जल उपयोग पर जोर दे रहा है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश बातचीत के जरिए समाधान तलाशते हैं या यह विवाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक गहराता है।
सिंधु जल संधि, Indus Water Treaty, भारत पाकिस्तान जल विवाद, Pakistan Indus Water Treaty, Jammu Kashmir Water, India Pakistan Relations, Indus River, भारत पाकिस्तान समाचार, जल संधि विवाद, Indus Water News, नयाक मीडिया, nayakmedia.in
Post a Comment