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20 साल से नहीं बढ़ी मजदूरी, महंगाई ने तोड़ी कमर: चंदौली के जरी-जरदोजी कारीगरों ने सरकार से लगाई गुहार


नायक भारतीय नायक | चंदौली

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का दुल्हीपुर क्षेत्र लंबे समय से जरी-जरदोजी और बुनकरी कला के लिए जाना जाता है। यहां के सथकोहरी गांव में आज भी सैकड़ों परिवार इसी पारंपरिक हुनर के सहारे अपना जीवन यापन करते हैं। लेकिन समय के साथ जहां महंगाई लगातार बढ़ती चली गई, वहीं इन कारीगरों की मेहनताना लगभग वहीं की वहीं ठहर गई। नतीजा यह है कि कभी सम्मानजनक रोजगार माने जाने वाला यह काम अब परिवार का गुजारा चलाने के लिए भी पर्याप्त नहीं रह गया है।

गांव के कारीगरों का कहना है कि पिछले करीब दो दशकों में उनकी मजदूरी में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं हुई। दूसरी ओर खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च कई गुना बढ़ चुका है। ऐसे में मेहनत करने के बावजूद परिवार का खर्च निकालना मुश्किल होता जा रहा है।

तीन दिन की मेहनत, लेकिन मजदूरी सिर्फ 300 से 350 रुपये

स्थानीय कारीगर असरारुल बताते हैं कि एक भारी जरीदार साड़ी तैयार करने में दो से तीन लोगों को लगातार दो से तीन दिन तक मेहनत करनी पड़ती है। महीन कढ़ाई, डिजाइन और हाथ से किए जाने वाले काम में घंटों की मेहनत लगती है। इसके बावजूद पूरी मेहनत का भुगतान केवल 300 से 350 रुपये तक मिलता है।

कारीगरों का कहना है कि इतनी कम आय में परिवार का पालन-पोषण करना लगभग असंभव हो गया है। कई बार पूरे सप्ताह मेहनत करने के बाद भी इतनी कम कमाई होती है कि घर का राशन और बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकालना कठिन हो जाता है।

बढ़ती महंगाई ने बढ़ाई चिंता

बीते वर्षों में रसोई गैस, खाद्यान्न, दवाइयों, बिजली और परिवहन का खर्च लगातार बढ़ा है। गांव के कई परिवारों का कहना है कि पहले कम आय में भी किसी तरह गुजारा हो जाता था, लेकिन अब वही आय परिवार की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पा रही है।

कारीगरों का कहना है कि यदि मजदूरी समय-समय पर बढ़ाई जाती तो आज उनकी स्थिति इतनी खराब नहीं होती। उनका मानना है कि महंगाई के अनुपात में मेहनताना बढ़ना भी जरूरी है।

पारंपरिक कला पर संकट

जरी-जरदोजी केवल रोजगार नहीं बल्कि एक पारंपरिक कला भी है। इस काम में वर्षों का अनुभव और विशेष कौशल लगता है। सुंदर डिजाइन तैयार करने के लिए धैर्य, एकाग्रता और बारीक हस्तकला की जरूरत होती है।

लेकिन कम आय के कारण नई पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही है। कई युवा अब दिहाड़ी मजदूरी, फैक्ट्री या दूसरे शहरों में नौकरी तलाशने लगे हैं क्योंकि वहां अपेक्षाकृत अधिक आय मिल जाती है।

यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में यह पारंपरिक कला प्रभावित हो सकती है।

बिचौलियों की भूमिका पर भी सवाल

कारीगरों का कहना है कि बाजार में जरीदार साड़ियां और कपड़े ऊंचे दामों पर बिकते हैं, लेकिन असली मेहनत करने वाले कारीगरों तक उसका लाभ नहीं पहुंचता। उनका आरोप है कि उत्पादन और बिक्री के बीच मौजूद बिचौलियों को अधिक फायदा मिलता है जबकि कारीगरों को बहुत कम भुगतान किया जाता है।

उनका मानना है कि यदि उन्हें सीधे बाजार या खरीदारों से जोड़ने की व्यवस्था हो तो उनकी आय में सुधार हो सकता है।

सरकार से क्या मांग है?

कारीगरों ने सरकार से कई मांगें रखी हैं। इनमें प्रमुख रूप से—

  • जरी-जरदोजी कारीगरों की मजदूरी में वृद्धि।
  • पारंपरिक हस्तशिल्प के लिए विशेष सहायता योजना।
  • कारीगरों को सामाजिक सुरक्षा और बीमा सुविधा।
  • आसान ऋण और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराना।
  • उत्पादों की बेहतर मार्केटिंग और निर्यात को बढ़ावा देना।
  • कारीगरों के बच्चों की शिक्षा और कौशल विकास के लिए विशेष योजनाएं।

कारीगरों का कहना है कि यदि सरकार समय रहते हस्तक्षेप करती है तो हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है।

विशेषज्ञ क्या मानते हैं?

हस्तशिल्प क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की पारंपरिक कला और कारीगरी विश्वभर में पहचान रखती है। लेकिन यदि कारीगरों को उचित पारिश्रमिक नहीं मिलेगा तो यह कला धीरे-धीरे समाप्त होने लगेगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल उत्पादन बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि मूल्य निर्धारण, बाजार तक पहुंच और सरकारी सहायता भी उतनी ही आवश्यक है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर

सथकोहरी गांव और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परिवार इसी काम पर निर्भर हैं। यदि कारीगरों की आय लगातार घटती रही तो इसका असर पूरे स्थानीय बाजार पर पड़ेगा। छोटी दुकानों, कपड़ा व्यापारियों और अन्य स्थानीय व्यवसायों पर भी इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हस्तशिल्प का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। इसलिए इस क्षेत्र की समस्याओं का समाधान केवल कारीगरों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे इलाके के आर्थिक विकास के लिए भी जरूरी माना जा रहा है।

सम्मानजनक जीवन की उम्मीद

कारीगरों का कहना है कि वे किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे, बल्कि अपनी मेहनत के अनुरूप उचित मजदूरी चाहते हैं। उनका कहना है कि यदि मेहनत का उचित मूल्य मिले तो वे अपने परिवार का पालन-पोषण सम्मानपूर्वक कर सकते हैं और अपनी पारंपरिक कला को भी आगे बढ़ा सकते हैं।

उनका मानना है कि सरकार, प्रशासन और संबंधित विभाग यदि इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान दें तो हजारों कारीगर परिवारों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

निष्कर्ष

चंदौली के सथकोहरी गांव के जरी-जरदोजी कारीगरों की आवाज केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि देश के अनेक पारंपरिक हस्तशिल्प क्षेत्रों की हकीकत को सामने लाती है। लगातार बढ़ती महंगाई और वर्षों से स्थिर मजदूरी ने इन परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित विभाग कारीगरों की मांगों पर क्या कदम उठाते हैं। यदि समय रहते प्रभावी पहल की जाती है तो न केवल हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सकती है, बल्कि भारत की समृद्ध जरी-जरदोजी कला को भी नई मजबूती मिल सकती है।

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