नई दिल्ली/गांधीनगर: देश में स्कूली शिक्षा को लेकर जारी सकारात्मक दावों के बीच UDISE+ 2025-26 की रिपोर्ट ने गुजरात की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में स्कूल में दाखिला लेने वाले 45.5 प्रतिशत छात्र कक्षा 12 तक पहुंच ही नहीं पाते, जबकि केवल 54.5 प्रतिशत छात्र ही अपनी स्कूली शिक्षा 12वीं तक जारी रख पाते हैं। इसके अलावा माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 12.5 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत 7 प्रतिशत से काफी अधिक है।
यह आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब केंद्र सरकार शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल सुविधाओं, शिक्षक संख्या और बुनियादी ढांचे में सुधार को बड़ी उपलब्धि बता रही है। राष्ट्रीय स्तर पर जहां ड्रॉपआउट दर में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं गुजरात के आंकड़ों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर राज्य में इतने बड़े स्तर पर छात्र स्कूल क्यों छोड़ रहे हैं।
क्या कहती है UDISE+ रिपोर्ट?
UDISE+ (Unified District Information System for Education Plus) देश के स्कूलों से जुड़ा आधिकारिक डाटाबेस है, जिसमें छात्र संख्या, शिक्षक, स्कूलों की स्थिति, बुनियादी सुविधाएं और ड्रॉपआउट जैसे महत्वपूर्ण आंकड़े दर्ज किए जाते हैं।
2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात में लगभग 1.15 करोड़ छात्र विभिन्न स्कूलों में नामांकित हैं। हालांकि, इनमें से बड़ी संख्या माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचने से पहले ही शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाती है। राज्य की रिटेंशन रेट 54.5 प्रतिशत दर्ज की गई है, यानी लगभग आधे विद्यार्थी 12वीं तक अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाते।
राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे गुजरात
देशभर के आंकड़ों पर नजर डालें तो माध्यमिक स्तर पर राष्ट्रीय ड्रॉपआउट दर 7 प्रतिशत है, जबकि गुजरात में यह 12.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी राष्ट्रीय औसत की तुलना में राज्य की स्थिति काफी कमजोर दिखाई देती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में विद्यार्थी 10वीं और 12वीं से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं तो इसका सीधा असर उच्च शिक्षा, रोजगार और राज्य के सामाजिक विकास पर पड़ता है।
आखिर क्यों छोड़ रहे हैं छात्र स्कूल?
हालांकि रिपोर्ट ड्रॉपआउट के कारणों का विस्तार से उल्लेख नहीं करती, लेकिन शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकार कई संभावित वजहें बताते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक कठिनाइयों के कारण कई परिवार बच्चों को जल्दी काम पर भेज देते हैं। कई छात्र परिवार की आय बढ़ाने के लिए मजदूरी या छोटे-मोटे रोजगार में लग जाते हैं।
कुछ इलाकों में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों की दूरी भी बड़ी समस्या है। विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों को कई किलोमीटर दूर स्कूल जाना पड़ता है, जिससे पढ़ाई बीच में छोड़ने की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बोर्ड परीक्षाओं का दबाव, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की कमी, निजी ट्यूशन का खर्च और सामाजिक परिस्थितियां भी ड्रॉपआउट के महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर अलग
दिलचस्प बात यह है कि पूरे देश में शिक्षा से जुड़े कई संकेतकों में सुधार दर्ज किया गया है।
UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार:
माध्यमिक स्तर पर राष्ट्रीय ड्रॉपआउट दर घटकर 7 प्रतिशत हुई।
देश में पहली बार शिक्षकों की संख्या 1.02 करोड़ से अधिक पहुंची।
डिजिटल सुविधाओं, इंटरनेट और कंप्यूटर वाले स्कूलों की संख्या बढ़ी।
माध्यमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (GER) में भी सुधार दर्ज किया गया।
ऐसे में गुजरात के आंकड़े और भी अधिक चिंता पैदा करते हैं।
शिक्षा केवल नामांकन नहीं, निरंतरता भी जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी राज्य की शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने बच्चों का स्कूल में दाखिला हुआ। असली सफलता तब मानी जाती है जब छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करें।
यदि बड़ी संख्या में विद्यार्थी बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं तो इसका अर्थ है कि शिक्षा व्यवस्था उन्हें लंबे समय तक स्कूल से जोड़े रखने में सफल नहीं हो पा रही।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
गुजरात लंबे समय से औद्योगिक विकास और आर्थिक प्रगति के लिए जाना जाता है। ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र में सामने आए ये आंकड़े नीति निर्माताओं के लिए गंभीर चुनौती माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए स्कूल खोलना पर्याप्त नहीं होगा। विद्यार्थियों को स्कूल में बनाए रखने के लिए छात्रवृत्ति, परिवहन सुविधा, करियर मार्गदर्शन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत करना होगा।
ग्रामीण और कमजोर वर्गों पर विशेष ध्यान की जरूरत
शिक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि ड्रॉपआउट की समस्या अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों, ग्रामीण इलाकों और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों में अधिक दिखाई देती है।
ऐसे विद्यार्थियों के लिए विशेष योजनाएं, स्थानीय स्तर पर निगरानी और समुदाय की भागीदारी बढ़ाने से स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।
क्या कहता है शिक्षा का अधिकार?
भारत में 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून लागू है। हालांकि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक विद्यार्थियों को बनाए रखना अभी भी राज्यों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
यदि विद्यार्थी 9वीं, 10वीं या 11वीं के दौरान स्कूल छोड़ देते हैं तो उनके लिए उच्च शिक्षा और बेहतर रोजगार के अवसर सीमित हो जाते हैं।
आगे क्या?
UDISE+ रिपोर्ट के सामने आने के बाद उम्मीद की जा रही है कि राज्य सरकार इन आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करेगी और उन जिलों की पहचान करेगी जहां ड्रॉपआउट दर सबसे अधिक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो हजारों विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
निष्कर्ष
UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट ने गुजरात की स्कूली शिक्षा व्यवस्था के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है। जहां देश के कई शिक्षा संकेतकों में सुधार दिखाई दे रहा है, वहीं गुजरात में लगभग आधे विद्यार्थियों का 12वीं तक नहीं पहुंच पाना चिंता का विषय है। यह केवल आंकड़ों का मामला नहीं, बल्कि लाखों बच्चों के भविष्य, उनके सपनों और राज्य की मानव संसाधन क्षमता से जुड़ा सवाल है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकार और शिक्षा विभाग किस तरह के ठोस कदम उठाते हैं।
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