नई दिल्ली: महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों की भाषा और न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम हस्तक्षेप किया है। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसकी छाती दबाने के कृत्य को बलात्कार के प्रयास के लिए पर्याप्त नहीं माना गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आरोपी हिमांशु पाठक को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कुछ ऐसे हिस्से हैं, जिन पर आपत्ति है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी को सुने बिना हाईकोर्ट के फैसले को रद्द नहीं किया जा सकता।
9 जुलाई को पटना हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
यह मामला वर्ष 2008 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक महिला जब अपने पिता के साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए एक स्टूडियो गई थी, तब आरोपी ने उसे कथित तौर पर अंदर रोक लिया और उसके साथ यौन दुर्व्यवहार किया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बलात्कार के प्रयास समेत अन्य आरोपों में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
इसके खिलाफ अपील पर पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2026 को आरोपी को बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसे पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे बलात्कार के प्रयास का अपराध स्पष्ट रूप से साबित हो। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपों को पूरी तरह सही मानने पर भी वे IPC की धारा 354 के तहत महिला की गरिमा भंग करने के अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं।
हाईकोर्ट के मुताबिक, मामले में बलात्कार के प्रयास को साबित करने के लिए आवश्यक स्पष्ट कृत्य या साक्ष्य सामने नहीं आए थे। फैसले में अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए गवाहों और जांच से जुड़े पहलुओं का भी उल्लेख किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लिया स्वतः संज्ञान?
पटना हाईकोर्ट के फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचा। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने अदालत का ध्यान इस फैसले की ओर दिलाया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने suo motu यानी स्वतः संज्ञान लेकर मामले को दर्ज किया। अदालत ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक भाषा और संवेदनशीलता को लेकर भी चिंता जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को आरोपी तक नोटिस पहुंचाने में स्थानीय पुलिस की मदद करने का निर्देश दिया है। अब आरोपी का पक्ष सुनने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि पटना हाईकोर्ट के फैसले में जिन हिस्सों पर आपत्ति जताई गई है, उनके संबंध में आगे क्या आदेश दिया जाए।
इस मामले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह केवल एक फैसले तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि यौन अपराधों के मामलों में कानून की व्याख्या करते समय पीड़िता की गरिमा, उपलब्ध साक्ष्य और न्यायिक भाषा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की अंतिम टिप्पणी और आदेश का इंतजार है।
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