छतरपुर: मध्य प्रदेश में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से प्रभावित आदिवासी परिवारों का विरोध प्रदर्शन एक बार फिर चर्चा में है। प्रभावित लोगों का कहना है कि परियोजना के कारण उनके घर, जमीन और आजीविका प्रभावित हो रही है, लेकिन मुआवजे और पुनर्वास को लेकर उनकी कई शिकायतों का समाधान अभी बाकी है। इसी बीच प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए महिलाओं के साथ कथित बदसलूकी के आरोप लगाए हैं। हालांकि, प्रशासन और केंद्र सरकार की ओर से मुआवजे और प्रदर्शन को लेकर अलग दावे किए गए हैं।
मुआवजा और पुनर्वास बना मुख्य मुद्दा
केन-बेतवा लिंक परियोजना बुंदेलखंड क्षेत्र की एक बड़ी नदी जोड़ो परियोजना है। सरकारी जानकारी के अनुसार इसका उद्देश्य केन नदी के पानी को बेतवा नदी तक पहुंचाकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की सुविधा बढ़ाना है। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 44,605 करोड़ रुपये बताई गई है।
लेकिन परियोजना से प्रभावित परिवारों का कहना है कि जमीन और संपत्तियों के सर्वे तथा मुआवजे की प्रक्रिया में कई लोगों की शिकायतें हैं। कुछ परिवारों का दावा है कि उनके नाम प्रभावित लोगों की सूची में शामिल नहीं किए गए या उन्हें अपेक्षित मुआवजा नहीं मिला। हाल की रिपोर्टों में भी प्रभावित परिवारों द्वारा मुआवजे की दर और सर्वे से जुड़ी अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।
प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर लगाए आरोप
छतरपुर में बाराना नदी के किनारे प्रभावित ग्रामीणों और आदिवासी परिवारों ने विरोध का अलग तरीका अपनाया था। आंदोलन के दौरान ‘चिता आंदोलन’ और ‘जल सत्याग्रह’ जैसे प्रतीकात्मक प्रदर्शन किए गए। जुलाई में पुलिस और प्रशासन ने प्रदर्शन स्थल खाली कराया था। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि इस दौरान पुलिस ने बल का इस्तेमाल किया और महिलाओं के साथ भी कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया।
दूसरी ओर, पुलिस और प्रशासन का कहना था कि लगातार बारिश के कारण नदी का जलस्तर बढ़ रहा था और प्रदर्शन स्थल लोगों के लिए सुरक्षित नहीं रह गया था। प्रशासन के मुताबिक, इसी वजह से प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाया गया और लंबे समय से अनशन कर रहे आंदोलनकारी अमित भटनागर को स्वास्थ्य जांच के बाद अस्पताल ले जाया गया।
‘माताओं’ के सम्मान का सवाल क्यों उठा?
प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक वक्तव्यों में माताओं के सम्मान और महत्व का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि अगर आंदोलन में शामिल महिलाओं के साथ पुलिस द्वारा कथित तौर पर ज्यादती होती है, तो उनकी शिकायतों पर सरकार की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए।
यह सवाल प्रदर्शनकारियों की ओर से उठाया गया है और इसे उनके विरोध के राजनीतिक-सामाजिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। पुलिस पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के आधार पर नहीं हुई है।
सरकार का क्या कहना है?
केंद्र सरकार ने अगस्त 2026 में जारी एक आधिकारिक स्पष्टीकरण में उन दावों को गलत और भ्रामक बताया था कि प्रभावित आदिवासी परिवारों को मुआवजा या पुनर्वास नहीं दिया गया है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार अधिकांश पात्र परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास लाभ मिल चुके हैं तथा कुछ मामलों में औपचारिकताएं बाकी हैं। सरकार ने यह भी कहा कि पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया संबंधित कानून और मध्य प्रदेश के विशेष पुनर्वास पैकेज के तहत चल रही है।
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू है—एक तरफ सरकार परियोजना के लाभ और मुआवजा प्रक्रिया को सामने रख रही है, वहीं प्रभावित परिवार अपने अनुभव और शिकायतों के आधार पर सवाल उठा रहे हैं। अब निगाह इस बात पर है कि प्रशासन इन शिकायतों का समाधान किस तरह करता है और पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है या नहीं।
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