नई दिल्ली: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली का दीक्षांत समारोह आम तौर पर छात्रों की वर्षों की मेहनत, उपलब्धियों और भविष्य की शुरुआत का अवसर होता है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी को लेकर समारोह से पहले की तैयारियां चर्चा में आ गई हैं। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ IIT दिल्ली छात्रों ने आयोजन की तैयारियों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर असहजता जताई है।
IIT दिल्ली की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, 2026 का दीक्षांत समारोह 8 अगस्त 2026 को निर्धारित था। संस्थान ने समारोह के लिए अलग आधिकारिक पोर्टल भी बनाया है।
छात्रों ने क्या आरोप लगाए?
द टेलीग्राफ से बातचीत के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, कुछ छात्रों ने कहा कि कैंपस में बार-बार आईडी जांच और मेटल डिटेक्टर से गुजरने जैसी सुरक्षा प्रक्रियाओं के कारण उन्हें परेशानी हुई। रिपोर्ट में एक छात्रा के हवाले से यह भी कहा गया कि समारोह की ड्रेस रिहर्सल में कार्यक्रम की पूरी व्यवस्था प्रधानमंत्री की मौजूदगी को केंद्र में रखकर की गई।
सबसे ज्यादा चर्चा उस दावे की हुई, जिसमें कहा गया कि मेडल लेने के दौरान छात्रों को कितना सिर झुकाना है, इसकी भी जानकारी दी गई। साथ ही, रिपोर्ट के अनुसार वैदिक मंत्रोच्चार के दौरान छात्रों को खड़े रहने के निर्देश दिए गए थे।
यहां एक जरूरी फर्क समझना भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध सामग्री से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि छात्रों को प्रधानमंत्री के सामने व्यक्तिगत रूप से ‘दंडवत’ या किसी अपमानजनक तरीके से झुकने के लिए मजबूर किया गया। मेडल पहनाने के दौरान सिर झुकाना कई दीक्षांत समारोहों में सामान्य प्रक्रिया हो सकती है। विवाद मुख्य रूप से इस बात पर है कि उस झुकने की सीमा तक के निर्देश क्यों दिए गए और समारोह की तैयारी कितनी हद तक प्रोटोकॉल-केंद्रित थी।
माता-पिता को लेकर भी उठे सवाल
रिपोर्ट में छात्रों की ओर से यह शिकायत भी सामने आई कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम वाले हिस्से में अभिभावकों की मौजूदगी को लेकर पाबंदियां थीं। कुछ छात्रों ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि उनके माता-पिता, जिन्होंने उनकी पढ़ाई में वर्षों तक साथ दिया, वे अपने बच्चों को मंच पर सम्मानित होते हुए क्यों नहीं देख पाएंगे। कुछ अभिभावकों की यात्रा योजनाओं में बदलाव से भी परेशानी होने की बात कही गई।
सुरक्षा बनाम गरिमा की बहस
प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर कड़े इंतजाम होना अपने आप में असामान्य नहीं है। प्रधानमंत्री के सार्वजनिक कार्यक्रमों में सुरक्षा जांच और आवाजाही संबंधी प्रोटोकॉल स्वाभाविक रूप से अधिक सख्त होते हैं। इसलिए केवल सुरक्षा जांच को आधार बनाकर प्रशासन पर सवाल उठाना सही तस्वीर नहीं देगा।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सुरक्षा और अनुशासन के नाम पर किसी शैक्षणिक समारोह की मूल भावना पीछे छूट रही है?
IIT जैसे संस्थान केवल इंजीनियर तैयार करने की जगह नहीं हैं। वे सवाल पूछने, तर्क करने और स्वतंत्र सोच विकसित करने के केंद्र भी हैं। इसलिए यदि छात्रों को किसी औपचारिक प्रक्रिया को लेकर असुविधा है, तो संस्थान की जिम्मेदारी है कि वह उनकी चिंताओं को स्पष्ट करे।
सोशल मीडिया पर भी बहस तेज
रिपोर्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। एक पक्ष ने इसे अनावश्यक प्रोटोकॉल और सत्ता-केंद्रित आयोजन बताया, जबकि दूसरे पक्ष ने तर्क दिया कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा और समारोह की औपचारिकता के कारण ऐसी तैयारियां सामान्य हो सकती हैं।
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि आरोप और तथ्य के बीच फर्क रखा जाए। छात्रों के कथित अनुभव गंभीरता से सुने जाने चाहिए, लेकिन उन्हें अंतिम सत्य मानने से पहले IIT दिल्ली या आयोजन से जुड़े अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना जरूरी है।
आखिरकार, दीक्षांत समारोह का केंद्र कोई नेता नहीं, बल्कि वह छात्र होता है जिसने वर्षों की मेहनत के बाद अपनी डिग्री हासिल की है। यही वह भावना है जिसे किसी भी बड़े संस्थान के समारोह में सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए।
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