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कश्मीर की नई पीढ़ी क्या अब अपना हिसाब मांग रही है? ‘जेन-ज़ेड’ असंतोष के संकेतों को समझना होगा


श्रीनगर/नई दिल्ली: कश्मीर की राजनीति को समझने के लिए केवल 1990 के दशक की घटनाओं को याद करना पर्याप्त नहीं है। घाटी में एक ऐसी पीढ़ी बड़ी हो चुकी है, जिसका बचपन और युवावस्था अलग-अलग राजनीतिक बदलावों के बीच बीता है। इस पीढ़ी ने न तो 1990 के दौर का आतंकवाद उसी रूप में देखा, न ही वह उस दौर की प्रत्यक्ष राजनीतिक स्मृतियों के सहारे अपनी पूरी दुनिया को समझती है। इसके सामने सवाल कुछ और हैं—आज का कश्मीर कैसा है, यहां उसके लिए क्या संभावनाएं हैं और आने वाले कल में उसकी आवाज कितनी सुनी जाएगी?

इसी बदलते सामाजिक-राजनीतिक माहौल को लेकर वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र तिवारी ने अपने लेख में कश्मीर में ‘जेन-ज़ेड’ यानी नई युवा पीढ़ी के संभावित राजनीतिक असंतोष की संभावना पर चर्चा की है।

पुरानी कहानी से अलग है नई पीढ़ी का सवाल

कश्मीर में पिछले कुछ दशकों में राजनीति ने कई बड़े मोड़ देखे हैं। भाजपा-पीडीपी गठबंधन से लेकर उसके टूटने, विधानसभा के विघटन, अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव और उसके बाद की राजनीतिक व्यवस्था तक, घाटी का सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य लगातार बदला है।

लेकिन इन घटनाओं को देखने वाली आज की युवा पीढ़ी का नजरिया अलग हो सकता है। उसके लिए ये घटनाएं इतिहास की किताब का हिस्सा भर नहीं हैं। इनका असर उसके परिवार, शिक्षा, रोजगार, इंटरनेट, आवाजाही और राजनीतिक अभिव्यक्ति जैसे रोजमर्रा के सवालों पर पड़ता है।

यही वह जगह है जहां ‘नया कश्मीर’ जैसे राजनीतिक नारों और युवाओं की वास्तविक अपेक्षाओं के बीच अंतर को समझना जरूरी हो जाता है।

सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, भविष्य का भी है

किसी भी युवा समाज के लिए सबसे बड़ा सवाल होता है—मेरा भविष्य कहां है?

शिक्षा के बाद रोजगार मिलेगा या नहीं? निजी क्षेत्र कितना बड़ा है? सरकारी नौकरियों की संभावनाएं क्या हैं? राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस तरह होगा? स्थानीय मुद्दों पर निर्णय लेने में आम लोगों की कितनी भूमिका होगी?

कश्मीर की नई पीढ़ी भी इन सवालों से अलग नहीं है।

अगर युवाओं को लगता है कि उनकी समस्याओं का समाधान केवल सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था के स्तर पर तलाशा जा रहा है, जबकि रोजगार, शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक अवसरों जैसे सवाल पीछे छूट रहे हैं, तो असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि कश्मीर में किसी नए बड़े आंदोलन की शुरुआत हो चुकी है। ऐसी किसी संभावना को तथ्य की तरह पेश करना जल्दबाजी होगी। लेकिन सामाजिक संकेतों और युवाओं की बदलती राजनीतिक चेतना को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी।

370 के बाद की पीढ़ी का अपना अनुभव

अनुच्छेद 370 में बदलाव के बाद कश्मीर की राजनीति और प्रशासनिक संरचना में बड़ा परिवर्तन आया। समर्थकों ने इसे विकास और एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया, जबकि आलोचकों ने राजनीतिक अधिकारों और स्थानीय प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल उठाए।

अब इस पूरे दौर को देखने वाली युवा पीढ़ी धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बना रही है।

यही कारण है कि आने वाले समय में कश्मीर की राजनीति को केवल पुराने राजनीतिक नारों से समझना मुश्किल हो सकता है। नई पीढ़ी के लिए पहचान महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ अवसर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

वह पूछ सकती है—हमारे लिए बदला क्या? और जो बदला, उसका असर हमारी जिंदगी पर कितना पड़ा?

सोशल मीडिया ने बदला संवाद का तरीका

आज की पीढ़ी की एक खासियत यह भी है कि उसके पास संवाद के साधन पुराने दौर से बिल्कुल अलग हैं। सोशल मीडिया ने सूचना के प्रवाह को तेज किया है। युवा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को देखता है, दूसरे राज्यों और देशों के युवाओं से तुलना करता है और अपने अनुभवों को सार्वजनिक मंचों पर साझा कर सकता है।

इससे उम्मीदें भी बढ़ती हैं और सवाल भी।

कश्मीर में किसी संभावित युवा असंतोष को समझने के लिए इसलिए सिर्फ सड़कों पर दिखाई देने वाली राजनीतिक गतिविधियों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। विश्वविद्यालयों, सोशल मीडिया, रोजगार के आंकड़ों, स्थानीय चुनावों में भागीदारी और युवाओं की सार्वजनिक बातचीत को भी पढ़ना पड़ेगा।

क्या सरकार और राजनीतिक दल तैयार हैं?

सबसे बड़ा सवाल यही है।

अगर नई पीढ़ी सवाल पूछती है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली परीक्षा इस बात से होगी कि उन सवालों का जवाब कैसे दिया जाता है। असहमति को केवल कानून-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उसके पीछे मौजूद सामाजिक और आर्थिक कारणों को समझना ज्यादा जरूरी होगा।

कश्मीर की नई पीढ़ी को केवल अतीत का दर्शक बनाकर नहीं रखा जा सकता। वह अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर जवाब चाहती है।

कश्मीर का अगला राजनीतिक अध्याय शायद इसी सवाल से तय होगा—नई पीढ़ी को केवल ‘नया कश्मीर’ दिखाया जाएगा, या उसे अपने भविष्य के ‘नए कश्मीर’ को तय करने में हिस्सेदार भी बनाया जाएगा?

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