मणिपुर के 14 मेईतेई नागरिक संगठनों ने 2027 की जनगणना से पहले NRC लागू करने की मांग उठाई है। संगठनों का कहना है कि पहले नागरिकता का सत्यापन हो, जबकि कुकी-जो और नगा समुदायों ने इस मांग पर चिंता जताई है। जानिए पूरा मामला।
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2027 की जनगणना से पहले NRC की मांग ने मणिपुर में बढ़ाई हलचल, मेईतेई संगठनों और आदिवासी समूहों के बीच बढ़ी बहस
इंफाल। लगभग तीन वर्षों से जातीय तनाव और हिंसा के दौर से गुजर रहे मणिपुर में अब राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। राज्य के 14 मेईतेई नागरिक समाज संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि 2027 की जनगणना से पहले NRC लागू किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि राज्य में रहने वाले वास्तविक भारतीय नागरिक कौन हैं और अवैध प्रवासी कौन। �
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हालांकि, इस मांग ने एक नया विवाद भी खड़ा कर दिया है। कुकी-जो और नगा समुदायों से जुड़े कई संगठनों ने आशंका जताई है कि NRC की प्रक्रिया का इस्तेमाल उन्हें निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है। इसी वजह से यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। �
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मेईतेई संगठनों की मांग क्या है?
मेईतेई संगठनों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मणिपुर की जनसंख्या संरचना में बदलाव आया है। उनका आरोप है कि पड़ोसी म्यांमार से अवैध घुसपैठ के कारण राज्य की जनसांख्यिकी प्रभावित हुई है। उनका मानना है कि यदि बिना नागरिकता सत्यापन के जनगणना कराई गई तो भविष्य में जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों पर सवाल खड़े हो सकते हैं। �
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संगठनों का कहना है कि पहले NRC के जरिए नागरिकों की पहचान सुनिश्चित की जाए और उसके बाद ही जनगणना की प्रक्रिया आगे बढ़े।
क्यों बढ़ी है यह मांग?
मई 2023 में शुरू हुई जातीय हिंसा के बाद मणिपुर लगातार तनाव झेल रहा है। हिंसा में सैकड़ों लोगों की जान गई, हजारों परिवार विस्थापित हुए और कई इलाकों में आज भी अविश्वास का माहौल बना हुआ है।
ऐसे माहौल में नागरिकता और जनसंख्या से जुड़े मुद्दे फिर से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। कई मेईतेई संगठन मानते हैं कि राज्य की मौजूदा स्थिति को समझने और भविष्य की नीतियां तय करने के लिए पहले नागरिकता का सत्यापन जरूरी है। �
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आदिवासी समुदायों की चिंता
दूसरी ओर, कुकी-जो और कुछ नगा संगठनों ने इस मांग पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि NRC जैसी प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी विशेष समुदाय को संदेह के घेरे में लाने के लिए नहीं होना चाहिए।
इन संगठनों का कहना है कि यदि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं हुई तो इससे राज्य में पहले से मौजूद सामाजिक तनाव और बढ़ सकता है। �
NRC आखिर है क्या?
राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) एक ऐसा रजिस्टर है, जिसमें भारतीय नागरिकों का रिकॉर्ड रखा जाता है। इसका उद्देश्य नागरिकों और गैर-नागरिकों के बीच अंतर स्पष्ट करना है। अब तक पूरे देश में NRC लागू नहीं है। सबसे पहले इसका व्यापक प्रयोग असम में किया गया था। �
सरकार का क्या रुख है?
फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से मणिपुर में NRC लागू करने को लेकर कोई अंतिम घोषणा नहीं की गई है। हालांकि, राज्य में इस विषय पर लगातार चर्चा और विभिन्न संगठनों की ओर से ज्ञापन दिए जा रहे हैं। �
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि नागरिकता, जनगणना और जातीय पहचान जैसे मुद्दे बेहद संवेदनशील होते हैं। ऐसे मामलों में किसी भी फैसले से पहले सभी पक्षों की बात सुनना और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है, ताकि किसी भी समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा न हो।
निष्कर्ष
मणिपुर में 2027 की जनगणना से पहले NRC लागू करने की मांग ने एक बार फिर राज्य की जटिल सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जहां मेईतेई संगठन इसे जनसंख्या और नागरिकता के सत्यापन के लिए जरूरी बता रहे हैं, वहीं कुकी-जो और नगा समुदाय इस प्रक्रिया के संभावित प्रभावों को लेकर चिंतित हैं। अब सभी की नजर केंद्र और राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी है।
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