नई दिल्ली/इस्लामाबाद। भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty-IWT) को लेकर अपनाए गए सख्त रुख के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक और सामरिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है।
भारत ने साफ शब्दों में कहा है कि "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते", जिसके बाद पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों और अपने घरेलू विमर्श में इस मुद्दे को उठा रहा है। हाल के दिनों में पाकिस्तान सरकार ने इस विषय पर एक सम्मेलन आयोजित किया, जबकि अब पाकिस्तान सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद सईद ने भी इस मामले पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रतिष्ठित पाकिस्तानी अखबार डॉन में एक लेख लिखा है। उन्होंने विशेष रूप से भारत की रणबीर नहर का उल्लेख करते हुए इसे पाकिस्तान के लिए संभावित चुनौती बताया है।
हालांकि भारत की ओर से अब तक अपने रुख में किसी तरह की नरमी के संकेत नहीं मिले हैं। नई दिल्ली का कहना है कि सीमा पार आतंकवाद जारी रहने तक दोनों देशों के संबंध सामान्य नहीं हो सकते और जल सहयोग भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा।
क्या है सिंधु जल संधि?
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इस संधि पर तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।
इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों का जल दोनों देशों के बीच बांटा गया।
पूर्वी नदियां – रावी, ब्यास और सतलुज का उपयोग भारत को मिला।
पश्चिमी नदियां – सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश जल पाकिस्तान के हिस्से में गया, हालांकि भारत को इन नदियों पर सीमित उपयोग का अधिकार दिया गया।
दुनिया की सबसे सफल जल संधियों में गिनी जाने वाली यह व्यवस्था कई युद्धों और तनावपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद दशकों तक लागू रही।
भारत ने क्यों अपनाया सख्त रुख?
भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देता है और ऐसे माहौल में सामान्य द्विपक्षीय संबंध संभव नहीं हैं।
हाल के वर्षों में भारत ने कई बार स्पष्ट किया कि आतंकवाद और सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान भी चर्चा में रहा कि "खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते।"
भारत का मानना है कि यदि पाकिस्तान लगातार आतंकवाद को संरक्षण देता रहेगा तो जल सहयोग सहित अन्य समझौतों की समीक्षा स्वाभाविक है।
पाकिस्तान में क्यों बढ़ी चिंता?
भारत के रुख के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक नेतृत्व, सुरक्षा विशेषज्ञ और जल संसाधन विशेषज्ञ लगातार चिंता जता रहे हैं।
हाल ही में पाकिस्तान सरकार ने सिंधु जल संधि पर एक विशेष सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन में वक्ताओं ने दावा किया कि यदि भारत अपने अधिकारों का अधिकतम उपयोग करता है या जल प्रबंधन की नई परियोजनाओं को गति देता है तो पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले ही कई चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में सिंधु नदी प्रणाली उसके कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती है। यही कारण है कि वहां इस विषय को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।
रणबीर नहर को लेकर क्या कहा गया?
पाकिस्तान सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) मुहम्मद सईद ने पाकिस्तानी समाचार पत्र डॉन में प्रकाशित अपने लेख में भारत की रणबीर नहर का विशेष उल्लेख किया।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि भारत इस नहर की क्षमता बढ़ाता है या जल प्रबंधन की नई योजनाओं को लागू करता है तो पाकिस्तान को मिलने वाले पानी पर असर पड़ सकता है।
हालांकि भारत की ओर से इस लेख पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
जल विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी परियोजना का मूल्यांकन संबंधित संधि के प्रावधानों और तकनीकी तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
रणबीर नहर का निर्माण डोगरा शासन के दौरान जम्मू क्षेत्र में कराया गया था। यह नहर मुख्य रूप से कृषि सिंचाई के उद्देश्य से बनाई गई थी।
समय-समय पर इसके आधुनिकीकरण और क्षमता बढ़ाने को लेकर चर्चाएं होती रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अपने हिस्से के जल का अधिक प्रभावी उपयोग करने के लिए विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं और नहर प्रणालियों को विकसित कर सकता है, बशर्ते वे संबंधित कानूनी और तकनीकी मानकों के अनुरूप हों।
भारत के पास क्या अधिकार हैं?
सिंधु जल संधि भारत को पश्चिमी नदियों पर भी कुछ सीमित अधिकार देती है।
भारत इन नदियों पर—
जलविद्युत परियोजनाएं विकसित कर सकता है।
सिंचाई के लिए सीमित मात्रा में पानी का उपयोग कर सकता है।
कुछ परिस्थितियों में जल भंडारण संबंधी परियोजनाएं भी बना सकता है।
हालांकि इन सभी परियोजनाओं को संधि के निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन करना होता है।
भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि उसने संधि के तहत मिलने वाले अपने सभी अधिकारों का अभी तक पूर्ण उपयोग नहीं किया है।
पाकिस्तान की निर्भरता कितनी अधिक?
पाकिस्तान की लगभग पूरी कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर मानी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार—
गेहूं, चावल और कपास जैसी प्रमुख फसलें इसी जल पर आधारित हैं।
लाखों किसानों की आजीविका सिंधु नदी प्रणाली से जुड़ी हुई है।
पेयजल और औद्योगिक उपयोग का भी बड़ा हिस्सा इन्हीं नदियों से आता है।
यही वजह है कि पाकिस्तान में सिंधु जल संधि से जुड़ा कोई भी घटनाक्रम तुरंत राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाता है।
सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर भी व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली।
भारतीय यूजर्स ने पाकिस्तान के नेताओं और पूर्व सैन्य अधिकारियों के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत केवल अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग कर रहा है।
दूसरी ओर पाकिस्तान के कई यूजर्स ने जल संकट और भविष्य की चुनौतियों को लेकर चिंता व्यक्त की।
हालांकि सोशल मीडिया पर व्यक्त विचार व्यक्तिगत होते हैं और उन्हें आधिकारिक सरकारी रुख नहीं माना जा सकता।
क्या संधि पूरी तरह समाप्त हो सकती है?
अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि किसी भी द्विपक्षीय संधि को समाप्त करना या उसमें बड़ा बदलाव करना एक जटिल कानूनी प्रक्रिया है।
सिंधु जल संधि को लेकर भारत पहले भी यह कह चुका है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप उपलब्ध विकल्पों की समीक्षा कर रहा है।
यदि भविष्य में कोई बड़ा निर्णय लिया जाता है तो उसका असर केवल दोनों देशों पर ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के जल प्रबंधन और क्षेत्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है।
भारत की रणनीति क्या मानी जा रही है?
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब अपने हिस्से के जल संसाधनों का अधिकतम और प्रभावी उपयोग करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इस रणनीति में—
सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार,
जलविद्युत उत्पादन बढ़ाना,
नहरों का आधुनिकीकरण,
और जल संरक्षण से जुड़ी नई योजनाएं शामिल हो सकती हैं।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि इससे भारत को अपने अधिकारों का बेहतर उपयोग करने में मदद मिलेगी।
आगे क्या?
फिलहाल भारत अपने आधिकारिक रुख पर कायम है और पाकिस्तान लगातार इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रहा है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि—
दोनों देशों के बीच इस विषय पर कोई नई वार्ता होती है या नहीं।
भारत अपनी जल परियोजनाओं को किस गति से आगे बढ़ाता है।
पाकिस्तान इस विषय को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कितना आगे ले जा पाता है।
निष्कर्ष
सिंधु जल संधि केवल जल बंटवारे का समझौता नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों का एक महत्वपूर्ण आधार भी है। मौजूदा परिस्थितियों में भारत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। दूसरी ओर, पाकिस्तान में इस विषय को लेकर बढ़ती चिंता इस बात का संकेत है कि सिंधु नदी प्रणाली वहां की अर्थव्यवस्था और कृषि के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।
रणबीर नहर को लेकर पाकिस्तान के पूर्व सैन्य अधिकारी की टिप्पणी ने इस बहस को नया आयाम दिया है। हालांकि अंतिम स्थिति भारत की आधिकारिक नीतियों, भविष्य की जल परियोजनाओं और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।
(संपादकीय नोट: यह समाचार उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों और संबंधित पक्षों के बयानों पर आधारित है। इसमें उल्लिखित विचार, जहां लागू हों, संबंधित व्यक्तियों या पक्षों के दावे हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि से संबंधित किसी भी नीति या कानूनी स्थिति का अंतिम निर्धारण आधिकारिक सरकारी निर्णयों और लागू अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों के अनुसार होगा।)
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