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नेतन्याहू का बड़ा बयान: 'सिर्फ अमेरिका नहीं, भारत भी इज़रायल का मजबूत सहयोगी', जेडी वेंस के दावे पर दिया जवाब


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 इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि इज़रायल केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है, बल्कि भारत सहित कई देशों का समर्थन उसे प्राप्त है। जानिए पूरा विवाद और इसके कूटनीतिक मायने।


नई दिल्ली/तेल अवीव | विशेष रिपोर्ट

इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक महत्वपूर्ण बयान देकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस दावे को सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अमेरिका ही इज़रायल का एकमात्र मजबूत और प्रभावशाली सहयोगी है।

नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि इज़रायल को केवल अमेरिका का ही नहीं, बल्कि भारत सहित कई अन्य देशों का भी महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य-पूर्व में सुरक्षा स्थिति, लेबनान में सैन्य कार्रवाई, ईरान से जुड़े तनाव और अमेरिका-इज़रायल संबंधों को लेकर लगातार चर्चाएं हो रही हैं।


क्या कहा था जेडी वेंस ने?

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हाल ही में एक बयान में कहा था कि अमेरिका ही इज़रायल का सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली सहयोगी है। उनके अनुसार इज़रायल की सुरक्षा, सैन्य सहायता और रणनीतिक मजबूती में अमेरिका की भूमिका सबसे अहम रही है।

यह बयान ऐसे समय आया जब अमेरिका क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों में जुटा हुआ है।


नेतन्याहू ने दिया जवाब

फॉक्स न्यूज के कार्यक्रम "Fox News Sunday Briefing" में बातचीत के दौरान नेतन्याहू ने कहा कि इज़रायल के कई मित्र देश हैं और उनमें भारत भी प्रमुख है।

उन्होंने कहा कि—

"हमारे कुछ और दोस्त भी हैं, जैसे भारत। वहां लगभग 1.4 अरब लोग रहते हैं और हमें वहां से काफी समर्थन मिलता है।"

नेतन्याहू के इस बयान को भारत-इज़रायल संबंधों की सार्वजनिक सराहना के रूप में देखा जा रहा है।


भारत का क्यों किया जिक्र?

भारत और इज़रायल के बीच पिछले एक दशक में रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं।

दोनों देशों के बीच सहयोग कई क्षेत्रों में बढ़ा है, जिनमें शामिल हैं—

  • रक्षा सहयोग
  • कृषि तकनीक
  • साइबर सुरक्षा
  • जल प्रबंधन
  • अंतरिक्ष अनुसंधान
  • व्यापार और निवेश
  • आतंकवाद विरोधी सहयोग
  • हाई-टेक उद्योग

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत आज इज़रायल के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में शामिल है।


भारत-इज़रायल संबंधों का इतिहास

भारत ने वर्ष 1992 में इज़रायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए थे।

इसके बाद दोनों देशों के बीच संबंध धीरे-धीरे मजबूत होते गए।

वर्ष 2017 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इज़रायल दौरा दोनों देशों के रिश्तों में ऐतिहासिक मोड़ माना गया।

इसके बाद इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी भारत का दौरा किया था।

दोनों देशों ने रक्षा, तकनीक और निवेश समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया।


रक्षा क्षेत्र में बढ़ा सहयोग

भारत इज़रायल से कई अत्याधुनिक रक्षा उपकरण खरीदता है।

इनमें प्रमुख हैं—

  • एयर डिफेंस सिस्टम
  • मिसाइल तकनीक
  • ड्रोन
  • रडार सिस्टम
  • इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरण
  • निगरानी प्रणाली

दोनों देशों के बीच संयुक्त अनुसंधान और रक्षा उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।


कृषि क्षेत्र में भी मजबूत साझेदारी

इज़रायल की आधुनिक कृषि तकनीक भारत के कई राज्यों में अपनाई जा चुकी है।

ड्रिप इरिगेशन, माइक्रो सिंचाई, फल एवं सब्जी उत्पादन और जल संरक्षण जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

देशभर में कई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भी स्थापित किए गए हैं।


मध्य-पूर्व की बदलती राजनीति

नेतन्याहू का यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य-पूर्व में लगातार तनाव बना हुआ है।

हाल के महीनों में—

  • लेबनान सीमा पर संघर्ष
  • ईरान से जुड़े विवाद
  • गाजा युद्ध
  • क्षेत्रीय सुरक्षा संकट
  • अमेरिका की मध्यस्थता के प्रयास

जैसे मुद्दे लगातार अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहे हैं।


क्या अमेरिका और इज़रायल के रिश्तों में मतभेद हैं?

विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका और इज़रायल के बीच रणनीतिक साझेदारी अभी भी मजबूत बनी हुई है।

हालांकि कुछ मुद्दों पर दोनों देशों के दृष्टिकोण अलग हो सकते हैं।

इनमें शामिल हैं—

  • युद्धविराम
  • मानवीय सहायता
  • ईरान नीति
  • क्षेत्रीय सुरक्षा
  • सैन्य कार्रवाई की रणनीति

इसी पृष्ठभूमि में नेतन्याहू का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


भारत के लिए क्या मायने?

विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार नेतन्याहू द्वारा भारत का सार्वजनिक उल्लेख कई संकेत देता है।

प्रमुख संभावनाएं

  • भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका
  • रणनीतिक साझेदारी की स्वीकार्यता
  • रक्षा सहयोग का विस्तार
  • तकनीकी निवेश में वृद्धि
  • पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक स्थिति मजबूत होना

हालांकि भविष्य की नीतियां दोनों देशों की सरकारों के आधिकारिक निर्णयों पर निर्भर करेंगी।


क्या भारत ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया दी?

इस बयान पर भारत सरकार की ओर से समाचार लिखे जाने तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

भारत परंपरागत रूप से पश्चिम एशिया के मुद्दों पर संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की बात करता रहा है।

भारत इज़रायल के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने के साथ-साथ फ़िलिस्तीन के लिए भी अपने दीर्घकालिक समर्थन की नीति दोहराता रहा है।


विशेषज्ञों की राय

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि नेतन्याहू का बयान केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों का संकेत भी हो सकता है।

भारत आज—

  • दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
  • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है।
  • रक्षा और तकनीकी क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है।
  • जी-20 और अन्य वैश्विक मंचों पर प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है।

इसी कारण कई देश भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।


आगे क्या?

विशेषज्ञों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि—

  • अमेरिका इस बयान को किस तरह देखता है।
  • भारत और इज़रायल के बीच भविष्य में कौन-से नए समझौते होते हैं।
  • पश्चिम एशिया में बदलते हालात दोनों देशों के संबंधों को किस दिशा में ले जाते हैं।
  • क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का यह बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इज़रायल केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है, बल्कि भारत सहित अन्य मित्र देशों से भी उसे महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त है।

यह बयान भारत-इज़रायल संबंधों की मजबूती को रेखांकित करता है। हालांकि इसके व्यापक कूटनीतिक प्रभावों का आकलन आने वाले समय में दोनों देशों की आधिकारिक नीतियों, बयानों और क्षेत्रीय घटनाक्रमों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगा।

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