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भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीन की सदस्यता का किया समर्थन: क्या बदल रही है भारत की पश्चिम एशिया नीति?


NAYAK | भारतीय नायक | विशेष विश्लेषण

संयुक्त राष्ट्र (UN) में एक बार फिर फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर भारत का रुख चर्चा का विषय बन गया है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीन को पूर्ण सदस्यता (Full Membership) दिए जाने की मांग का समर्थन करते हुए साफ संदेश दिया कि वह दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) का लगातार समर्थक है। ऐसे समय में जब इज़रायल और हमास के बीच संघर्ष जारी है और पश्चिम एशिया की राजनीति बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रही है, भारत का यह रुख वैश्विक कूटनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हालांकि, भारत के इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे भारत की पुरानी विदेश नीति की निरंतरता बताया, जबकि कुछ ने सवाल उठाया कि भारत इज़रायल के साथ मजबूत रिश्ते होने के बावजूद फ़िलिस्तीन की सदस्यता का समर्थन क्यों कर रहा है।

ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारत की विदेश नीति आखिर कहती क्या है और इसके पीछे कूटनीतिक सोच क्या है।


भारत ने क्या समर्थन किया?

संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीन को पूर्ण सदस्यता देने के प्रस्ताव पर भारत ने समर्थन में मतदान किया। भारत का कहना है कि फ़िलिस्तीन और इज़रायल के बीच स्थायी शांति का रास्ता केवल "दो-राष्ट्र समाधान" से होकर जाता है।

भारत का मानना है कि फ़िलिस्तीन के लोगों को भी एक स्वतंत्र, संप्रभु और मान्यता प्राप्त राष्ट्र के रूप में जीने का अधिकार मिलना चाहिए।

यही कारण है कि भारत वर्षों से संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीन के पक्ष में कई प्रस्तावों का समर्थन करता रहा है।


क्या भारत इज़रायल के खिलाफ हो गया?

इस सवाल का जवाब नहीं है।

यही भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता है।

एक ओर भारत इज़रायल के साथ रक्षा, कृषि, साइबर सुरक्षा, ड्रोन तकनीक, मिसाइल सिस्टम और खुफिया सहयोग को लगातार मजबूत कर रहा है।

दूसरी ओर भारत फ़िलिस्तीन के लोगों के मानवीय अधिकारों और स्वतंत्र राष्ट्र की मांग का भी समर्थन करता है।

यानी भारत किसी एक पक्ष का अंध समर्थन नहीं करता बल्कि दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।


भारत और फ़िलिस्तीन के रिश्तों का इतिहास

भारत उन शुरुआती देशों में शामिल था जिसने फ़िलिस्तीन के अधिकारों का खुलकर समर्थन किया।

  • 1974 में भारत ने PLO (Palestine Liberation Organization) को मान्यता दी।
  • 1988 में भारत ने फ़िलिस्तीन राष्ट्र को आधिकारिक मान्यता दी।
  • 1996 में गाज़ा में भारत ने अपना प्रतिनिधि कार्यालय खोला।
  • भारत लगातार फ़िलिस्तीन को आर्थिक सहायता देता रहा है।

स्वास्थ्य, शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी और आधारभूत ढांचे में भारत कई परियोजनाओं को सहायता देता रहा है।


फिर इज़रायल से दोस्ती कैसे हुई?

1992 में भारत और इज़रायल के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए।

इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत होते गए।

आज इज़रायल भारत के सबसे बड़े रक्षा साझेदारों में शामिल है।

भारत इज़रायल से खरीदता है—

  • मिसाइल सिस्टम
  • रडार
  • ड्रोन
  • निगरानी तकनीक
  • कृषि तकनीक
  • जल प्रबंधन तकनीक

इसके अलावा आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी दोनों देशों का सहयोग काफी मजबूत माना जाता है।


मोदी सरकार की नीति क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में पहली बार भारत और इज़रायल के रिश्तों को खुलकर सार्वजनिक मंच मिला।

2017 में प्रधानमंत्री मोदी इज़रायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने।

इसके बाद इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी भारत आए।

लेकिन इसी दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने फ़िलिस्तीन का भी दौरा किया।

यह संदेश साफ था—

भारत इज़रायल का मित्र है लेकिन फ़िलिस्तीन को भी नहीं छोड़ेगा।


गाज़ा युद्ध के बाद भारत की चुनौती

7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इज़रायल ने गाज़ा में सैन्य अभियान शुरू किया।

इस युद्ध में हजारों लोगों की मौत हुई।

दुनिया दो हिस्सों में बंटती नजर आई।

अमेरिका खुलकर इज़रायल के साथ खड़ा दिखाई दिया जबकि कई देशों ने फ़िलिस्तीन के समर्थन में आवाज उठाई।

भारत ने शुरुआत में आतंकवादी हमले की निंदा की लेकिन साथ ही नागरिकों की मौत पर चिंता भी जताई।

भारत लगातार मानवीय सहायता भी भेजता रहा।

यानी भारत ने दोनों पक्षों के बीच संतुलित नीति अपनाने की कोशिश की।


संयुक्त राष्ट्र में भारत का वोट क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति है।

G20, BRICS, SCO और QUAD जैसे वैश्विक मंचों पर उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।

ऐसे में संयुक्त राष्ट्र में भारत का हर वोट अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अपने वोट के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक है।


क्या फ़िलिस्तीन अभी संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन गया?

नहीं।

फ़िलिस्तीन अभी संयुक्त राष्ट्र का पूर्ण सदस्य नहीं है।

वर्तमान में उसके पास Observer State (पर्यवेक्षक राज्य) का दर्जा है।

पूर्ण सदस्य बनने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की सिफारिश और महासभा की स्वीकृति आवश्यक होती है।

सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों का वीटो भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यही कारण है कि सदस्यता का मुद्दा लंबे समय से अटका हुआ है।


भारत को इससे क्या लाभ?

विदेश नीति विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत कई स्तरों पर संतुलन बनाए रखना चाहता है।

1. अरब देशों के साथ संबंध

भारत के करोड़ों प्रवासी खाड़ी देशों में काम करते हैं।

भारत का बड़ा तेल आयात भी इसी क्षेत्र से होता है।

इसलिए अरब देशों के साथ मजबूत संबंध भारत की आर्थिक जरूरत भी हैं।

2. इज़रायल के साथ रणनीतिक साझेदारी

रक्षा तकनीक, सुरक्षा और नवाचार के क्षेत्र में इज़रायल भारत का अहम साझेदार है।

3. वैश्विक छवि

भारत स्वयं को ऐसी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है जो संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता देती है।


सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ी बहस?

भारत के समर्थन के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

कुछ लोगों ने कहा कि भारत को केवल इज़रायल का समर्थन करना चाहिए।

दूसरे पक्ष ने कहा कि भारत का रुख अंतरराष्ट्रीय कानून और ऐतिहासिक नीति के अनुरूप है।

हालांकि विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया की बहस और सरकारी विदेश नीति में अक्सर बड़ा अंतर होता है।

सरकारें केवल भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेती हैं।


क्या भविष्य में भारत अपनी नीति बदलेगा?

फिलहाल इसके संकेत नहीं हैं।

भारत लगातार यह दोहराता रहा है कि—

  • आतंकवाद स्वीकार्य नहीं है।
  • नागरिकों की सुरक्षा जरूरी है।
  • गाज़ा में मानवीय सहायता पहुंचनी चाहिए।
  • इज़रायल को सुरक्षा का अधिकार है।
  • फ़िलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र बनने का अधिकार मिलना चाहिए।

यानी भारत दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की अपनी पुरानी नीति पर कायम दिखाई देता है।


निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र में फ़िलिस्तीन की सदस्यता के समर्थन का भारत का फैसला कोई अचानक लिया गया राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि दशकों पुरानी विदेश नीति की निरंतरता का हिस्सा है। भारत एक ओर इज़रायल के साथ अपने रणनीतिक, रक्षा और तकनीकी संबंधों को मजबूत बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर फ़िलिस्तीन के वैध अधिकारों और दो-राष्ट्र समाधान का भी समर्थन करता है।

आज जब पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य लगातार बदल रहा है, भारत की कोशिश है कि वह किसी एक पक्ष के बजाय संतुलित, व्यावहारिक और बहुपक्षीय कूटनीति अपनाए। यही नीति भारत को वैश्विक मंचों पर एक जिम्मेदार और संवाद-समर्थक शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद करती है।

फ़िलिस्तीन की सदस्यता पर भारत का समर्थन केवल एक मतदान नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि नई वैश्विक व्यवस्था में भारत अपने राष्ट्रीय हितों, अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक संतुलन—तीनों को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है।

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