नई दिल्ली: बॉलीवुड में जब भी सनी देओल और अक्षय खन्ना का नाम एक साथ आता है, दर्शकों के ज़हन में सबसे पहले 1997 की सुपरहिट फिल्म 'बॉर्डर' की याद ताजा हो जाती है। करीब तीन दशक बाद दोनों कलाकार निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा की कोर्टरूम ड्रामा फिल्म 'इक्का' में फिर से साथ नजर आए। फिल्म की घोषणा के साथ ही इसे लेकर दर्शकों के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। लोगों को उम्मीद थी कि यह फिल्म दमदार कहानी, शानदार कोर्टरूम ड्रामा और बेहतरीन अभिनय के दम पर सिनेमाघरों में नया इतिहास रचेगी। लेकिन रिलीज के बाद फिल्म उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी।
फिल्म में सनी देओल, अक्षय खन्ना, दीया मिर्जा और तिलोत्तमा शोम जैसे बेहतरीन कलाकार मौजूद हैं। सभी ने अपने-अपने किरदारों में शानदार अभिनय किया है। इसके बावजूद फिल्म दर्शकों को पूरी तरह बांधने में सफल नहीं हो पाई। बॉक्स ऑफिस पर भी इसका प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहा। आइए जानते हैं आखिर 'इक्का' के साथ ऐसा क्या हुआ कि इतनी मजबूत स्टारकास्ट होने के बावजूद फिल्म दर्शकों का दिल नहीं जीत सकी।
स्टारकास्ट बनी सबसे बड़ी ताकत
'इक्का' की सबसे बड़ी खासियत इसकी स्टारकास्ट है। सनी देओल अपने गंभीर और प्रभावशाली अंदाज में एक अनुभवी वकील की भूमिका निभाते नजर आते हैं। कोर्टरूम में उनके संवाद और स्क्रीन प्रेजेंस दर्शकों को प्रभावित करते हैं।
वहीं अक्षय खन्ना ने एक बार फिर साबित किया कि वे गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं के लिए बेहतरीन कलाकार हैं। उनके चेहरे के भाव, संवाद अदायगी और किरदार की गहराई फिल्म को मजबूती देने की कोशिश करती है।
दीया मिर्जा और तिलोत्तमा शोम ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। दोनों कलाकारों का अभिनय कहानी को भावनात्मक आधार देने में मदद करता है।
कहानी में नहीं दिखा दम
जहां कलाकारों ने अपना शत-प्रतिशत दिया, वहीं फिल्म की कहानी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी। कोर्टरूम ड्रामा फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत होती है—धारदार बहस, मजबूत तर्क, लगातार आने वाले ट्विस्ट और दर्शकों को अंत तक बांधे रखने वाला सस्पेंस।
'इक्का' में यही पहलू कमजोर नजर आता है। फिल्म की शुरुआत दिलचस्प होती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसका प्रभाव कम होता जाता है। कई दृश्य लंबे महसूस होते हैं और पटकथा कई जगह धीमी पड़ जाती है।
कोर्टरूम ड्रामा में नहीं दिखी रोमांचक बहस
दर्शकों को उम्मीद थी कि फिल्म में कोर्ट के भीतर जोरदार बहस, चौंकाने वाले खुलासे और कानूनी दांव-पेंच देखने को मिलेंगे। लेकिन फिल्म इन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती।
कोर्टरूम में होने वाली बहसें उतनी प्रभावशाली नहीं लगतीं, जितनी इस शैली की फिल्मों में अपेक्षा की जाती है। कई मौके ऐसे आते हैं जहां कहानी दर्शकों को रोमांचित कर सकती थी, लेकिन पटकथा उन संभावनाओं का पूरा फायदा नहीं उठा पाती।
निर्देशन में दिखी कमी
निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने फिल्म को गंभीर और यथार्थवादी बनाने की कोशिश की है। हालांकि उनका प्रयास कई जगह नजर आता है, लेकिन फिल्म का ट्रीटमेंट उतना प्रभावी नहीं बन पाया।
कहानी की गति असंतुलित रहती है। कुछ दृश्य बेहद प्रभावशाली हैं, जबकि कुछ हिस्से जरूरत से ज्यादा लंबे महसूस होते हैं। संपादन यदि थोड़ा और कसा हुआ होता तो फिल्म का असर कहीं अधिक बेहतर हो सकता था।
दमदार अभिनय भी नहीं बचा पाया फिल्म
सनी देओल और अक्षय खन्ना दोनों ही अपने अभिनय से फिल्म को संभालने की पूरी कोशिश करते हैं। कई दृश्यों में दोनों कलाकारों की मौजूदगी फिल्म को ऊंचाई देती है।
लेकिन केवल अभिनय के दम पर कोई फिल्म लंबे समय तक दर्शकों को बांधकर नहीं रख सकती। जब कहानी और पटकथा कमजोर पड़ जाती है तो बड़े कलाकार भी फिल्म को सफल नहीं बना पाते। 'इक्का' के साथ भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला।
बॉक्स ऑफिस पर क्यों पिछड़ी फिल्म?
फिल्म के कमजोर प्रदर्शन के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं।
कहानी में नयापन नहीं दिखा।
कोर्टरूम ड्रामा का रोमांच कम रहा।
पटकथा कई जगह धीमी रही।
बड़े ट्विस्ट और सरप्राइज की कमी महसूस हुई।
दर्शकों की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा थीं, जिन पर फिल्म खरी नहीं उतर सकी।
हालांकि शुरुआती दिनों में फिल्म को स्टारकास्ट का फायदा मिला, लेकिन बाद में दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने से इसकी कमाई प्रभावित हुई।
सोशल मीडिया पर मिली मिली-जुली प्रतिक्रिया
फिल्म देखने के बाद सोशल मीडिया पर दर्शकों ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी। कई लोगों ने सनी देओल और अक्षय खन्ना के अभिनय की जमकर तारीफ की। वहीं कुछ दर्शकों ने कहा कि फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले में और मेहनत की जरूरत थी।
कुछ दर्शकों का मानना है कि यदि पटकथा थोड़ी अधिक कसावट वाली होती और कोर्टरूम के दृश्य ज्यादा प्रभावशाली बनाए जाते तो फिल्म यादगार बन सकती थी।
तकनीकी पक्ष
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है और कोर्टरूम का माहौल वास्तविक महसूस होता है। बैकग्राउंड म्यूजिक भी कई दृश्यों में प्रभाव छोड़ता है। प्रोडक्शन वैल्यू भी अच्छी दिखाई देती है।
हालांकि तकनीकी मजबूती के बावजूद कहानी की कमजोरी इन सभी सकारात्मक पहलुओं पर भारी पड़ जाती है।
क्या फिल्म देखनी चाहिए?
अगर आप सनी देओल और अक्षय खन्ना के प्रशंसक हैं या गंभीर कोर्टरूम ड्रामा पसंद करते हैं तो 'इक्का' एक बार देखी जा सकती है। फिल्म में कलाकारों का अभिनय इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
लेकिन यदि आप तेज रफ्तार कहानी, लगातार ट्विस्ट और अंत तक सीट से बांधे रखने वाला कोर्टरूम थ्रिलर देखने की उम्मीद लेकर जाएंगे तो शायद थोड़ी निराशा हाथ लगे।
निष्कर्ष
'इक्का' उन फिल्मों में शामिल हो गई है, जिनमें शानदार कलाकार होने के बावजूद कमजोर पटकथा और सीमित रोमांच के कारण अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। सनी देओल और अक्षय खन्ना ने अपने अभिनय से पूरी ईमानदारी दिखाई, लेकिन कहानी में दम की कमी फिल्म पर भारी पड़ गई। अगर निर्देशक पटकथा को और धारदार बनाते, कोर्टरूम बहसों को ज्यादा प्रभावशाली रखते और दर्शकों के लिए कुछ बड़े सरप्राइज जोड़ते, तो यह फिल्म साल की यादगार कोर्टरूम ड्रामा फिल्मों में शामिल हो सकती थी।
फिलहाल 'इक्का' एक ऐसी फिल्म बनकर सामने आई है जो अपने कलाकारों के अभिनय के लिए याद रखी जाएगी, लेकिन कहानी और स्क्रीनप्ले के मामले में दर्शकों की ऊंची उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी।
Post a Comment