NAYAK | भारतीय नायक
मोदी सरकार के 12 साल: अच्छे दिनों के वादे कहाँ गए? 94 हजार स्कूल बंद, नौकरियाँ अधूरी, किसान आय दोगुनी का सपना टूटा
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2014 में जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए तो देशभर में एक आशा की लहर दौड़ गई थी। “अच्छे दिन आने वाले हैं” का नारा हर कोने में गूंज रहा था। युवाओं को सालाना दो करोड़ नौकरियों का वादा सुनाई दे रहा था। किसानों को 2022 तक आय दोगुनी करने का भरोसा दिया जा रहा था। काला धन वापस आने और हर गरीब के खाते में पंद्रह लाख रुपये जमा होने की बातें रैलियों में जोर-शोर से कही जा रही थीं। मेक इन इंडिया से भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का सपना दिखाया जा रहा था।
बारह साल बीत गए। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो कई सवाल मन में उठते हैं। क्या वाकई अच्छे दिन आ गए? या सिर्फ चुनावी जुमले रह गए?
रोजगार के मोर्चे पर स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। दो करोड़ नौकरियों का वादा आज भी अधूरा है। CMIE के आंकड़ों के अनुसार युवा बेरोजगारी, खासकर 20 से 24 साल के आयु वर्ग में, चालीस प्रतिशत के पार चली गई है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तो रोजगार घटा है। एक समय जहाँ पाँच करोड़ लोग काम कर रहे थे, वहाँ संख्या घटकर ढाई करोड़ के आसपास रह गई। लाखों युवा आज भी नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं।
काला धन का वादा भी अधर में लटक गया। रैलियों में कहा गया था कि विदेश में जमा काला धन वापस आएगा और हर नागरिक के खाते में पैसे आएंगे। बाद में खुद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने इसे “जुमला” करार दिया। किसी के खाते में वे पंद्रह लाख नहीं आए।
किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य भी 2022 में पूरा नहीं हो सका। विशेषज्ञों के अनुसार सालाना सिर्फ 2.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि दोगुना करने के लिए दस प्रतिशत से ज्यादा की दर जरूरी थी। पीएम किसान जैसी योजनाओं से थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन मूल वादा अधूरा रह गया।
मेक इन इंडिया का भी यही हाल है। मैन्युफैक्चरिंग का जीडीपी में हिस्सा पच्चीस प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया था। आज वह तेरह-चौदह प्रतिशत के आसपास ही घूम रहा है। बड़े-बड़े लॉगो और प्रचार अभियान तो चले, लेकिन जमीनी नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं निकले।
इन सबके बीच सबसे ज्यादा चिंता की बात शिक्षा क्षेत्र की है। नीति आयोग और संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस साल में करीब चौनव्वे हजार सरकारी स्कूल बंद हो गए। यानी हर दिन औसतन पच्चीस स्कूल बंद होते रहे। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में यह संख्या सबसे ज्यादा है। सरकारी स्कूलों की संख्या ग्यारह लाख से घटकर दस लाख के आसपास रह गई है, जबकि निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है।
शिक्षा बजट की स्थिति और भी चिंताजनक है। केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी 2013-14 में 4.6 प्रतिशत थी, जो घटकर 2.5 प्रतिशत रह गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जीडीपी का छह प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अभी भी चार प्रतिशत के आसपास ही अटका हुआ है।
शिक्षकों की कमी भी गंभीर समस्या है। आज भी देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। आंध्र प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह संकट सबसे ज्यादा है। बुनियादी सुविधाओं की कमी, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और शिक्षकों की कमी के कारण लाखों गरीब बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जा रहे हैं।
ये आंकड़े सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। ये उन परिवारों की कहानियाँ हैं जहाँ बच्चे दूर के स्कूल जाने को मजबूर हैं। ये उन युवाओं की निराशा है जो नौकरी न मिलने पर हताश हो रहे हैं। ये उन किसानों की पीड़ा है जिनकी आय दोगुनी होने का सपना अधूरा रह गया।
बेशक कुछ काम भी हुए हैं। जन धन योजना से करोड़ों लोगों के बैंक खाते खुले, उज्ज्वला से गैस कनेक्शन मिले, स्वच्छ भारत अभियान चला, यूपीआई ने डिजिटल भुगतान को आसान बनाया। ये उपलब्धियाँ नकारने योग्य नहीं हैं। लेकिन जब बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं तो उनकी जवाबदेही भी लेनी चाहिए।
आज जरूरत है कि हम सिर्फ नारों पर नहीं, आंकड़ों और जमीनी हकीकत पर बात करें। शिक्षा, रोजगार और किसानों की आय जैसे मुद्दे किसी एक सरकार के नहीं, पूरे देश के भविष्य के सवाल हैं। अच्छे दिन सिर्फ भाषणों से नहीं आते। वे तब आते हैं जब नीतियाँ सही हों, बजट पर्याप्त हो और जवाबदेही तय हो।
NAYAK भारतीय नायक के पाठकों से एक सवाल—क्या आप इन वादों और हकीकत के बीच के अंतर को महसूस करते हैं? अपने अनुभव कमेंट में साझा करें।
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